बाल मनोविज्ञान एवं बाल अध्ययन विधियाँ

Bal Adhyayan ki Vidhiyan Notes in Hindi

 बाल मनोविज्ञान एवं बाल अध्ययन विधियाँ

लॉक – इंग्लैंड के प्रसिद्ध दार्शनिक, अंतर्दर्शन विधि के प्रवर्तक

अंतर्दर्शन विधि – मनोविज्ञान की प्राचीनतम अध्ययन प्रणाली

➡ अंतर्दर्शन प्रणाली का प्रमुख लाभ – विषय- सामग्री व यंत्रों की आवश्यकता नहीं होना ।

➡ अंतर्दर्शन प्रणाली का प्रमुख दोष – पशुओं व बालकों पर लागू नहीं होना ।

बहिर्दर्शन विधि – प्राकृतिक निरीक्षण पद्धति

प्रायोगिक विधि – अनुसंधान की सर्वोत्तम विधि

विलियम बुंट – 1879 ई. में लीपजिंग में प्रयोगात्मक मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला स्थापित की ।

प्रश्नावली पद्धति – कागज पेंसिल परीक्षा विधि

व्यक्ति इतिहास विधि – इसका प्रयोग बाल अपराधियों के निदान हेतु किया जाता है ।

मनोविश्लेषणात्मक विधि – जन्मदाता फ्रायड

Bal adhyayan ki vidhiyan
Bal adhyayan ki vidhiyan

पद्धति – साधारण भाषा में पद्धति को कार्य करने का ढंग कहा जा सकता है ।

चार्ल्स गाइड के अनुसार – ” वैज्ञानिक भाषा में पद्धति शब्द का प्रयोग उस मार्ग के लिए किया जाता है जिसका सत्य की खोज के लिए अनुसरण करना आवश्यक है ।”

Bal Adhyayan ki Vidhiyan-

1. क्रमबद्ध चरित्र लेखन विधि

🔸इस विधि का उपयोग प्राचीन मनोवैज्ञानिकों विलियम प्रेयर , के.सी.मूर्रें, डी.आर.जेजर, जी.एस. गेल, जी.वी.एन. डर्बर ने किया ।

🔸प्रेयर ने चरित्र लेखन से यह जानने का प्रयास किया कि जन्म के समय कौन- कौन सी सहज क्रियाएँ पायी जाती है ।

🔸इस विधि में अध्ययनकर्त्ता बालक के व्यवहार का प्रतिदिन निरीक्षण करता है और निरीक्षण के आधार पर व्यवहार की विशेषताओं का क्रमबद्ध ढंग से नोट करके रिकॉर्ड तैयार करता है । यह रिकॉर्ड चरित्र लेखन कहलाता है ।

🔸इसमें बालक के व्यवहार का निरीक्षण स्वतंत्र वातावरण में किया जाता है ।

दोष-

🔸इस विधि का उपयोग उस अवस्था में ही किया जा सकता है जब अध्ययनकर्त्ता बालक के मधुर भावों और क्रियाओं से प्रभावित हो सकता है । इस अवस्था में एकत्रित रिकॉर्ड पक्षपात पूर्ण हो सकता है ।

🔸इस विधि में समय अधिक व्यय होता है ।

🔸इस विधि की कोई प्रमाणिक प्रक्रिया विधि नहीं है ।

🔸यह विधि वैज्ञानिक नहीं है ।

(2) निरीक्षण विधि

🔸इस विधि का उपयोग छोटे बच्चों और शिशुओं की समस्याओं के अध्ययन के लिए किया जाता है ।

🔸बाल मनोविज्ञान की समस्याओं के अध्ययन में इस विधि का सर्वप्रथम प्रयोग जर्मनी में हुआ ।

🔸अमेरिका में वाटसन ने इस विधि का उपयोग बालकों के प्राथमिक संवेगों के अध्ययन में किया ।

🔸इस विधि द्वारा बाल व्यवहार के निरीक्षण के भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने कुछ भिन्न भिन्न प्रणालियों को भी अपनाया है । प्रथम प्रणाली Diary Description प्रणाली है जिसे बायोग्राफी मैथोड कहते हैं ।

🔸दूसरी प्रणाली specimen description technique है । इसका उपयोग सी टूकर, आर सी बार्कर, एच ई हर्टले, पी वी गम्प ने किया ।

🔸तीसरी प्रणाली event simpling है जिसका उपयोग एच सी दवे, ए टी जर्सिल्ड, एम एच एपेल, पी वी गम्प, एफ एफ राइट ने किया ।

🔸निरीक्षण विधि में अध्ययन सावधानी से किया जाता है, नेत्रों का पूरी तरह उपयोग होता है , अध्ययन करने वाला प्रत्यक्ष रूप से भाग लेता है ।

🔸इस विधि की सहायता से सामूहिक व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है । इस विधि का उपयोग बहुधा प्राथमिक आंकड़ों के संकलन के लिए किया जाता है ।

🔸निरीक्षण विधि की सहायता से मनोविज्ञान की विभिन्न समस्याओं को प्राथमिक निरीक्षण के आधार पर चुनते हैं ।

निरीक्षण विधि के पद –

१. उपयुक्त योजना
२. व्यवहार का निरीक्षण
३. व्यवहार को नोट करना
४. विश्लेषण
५. व्याख्या और सामान्यीकरण

निरीक्षण विधि के प्रकार –

1. सरल अथवा अनियंत्रित निरीक्षण विधि

जब किसी घटना या व्यवहार का निरीक्षण प्राकृतिक परिस्थितियों में ज्यों का त्यों किया जाए तथा प्राकृतिक परिस्थितियों पर कोई बाह्य दबाव अध्ययनकर्त्ता द्वारा न डाला जाये, तो इस प्रकार के निरीक्षण को अनियंत्रित निरीक्षण कहते हैं ।

2. व्यवस्थित अथवा नियंत्रित परीक्षण विधि

जब निरीक्षणकर्त्ता और घटना दोनों पर नियंत्रण करके अध्ययन किया जाता है ,तो इस प्रकार की निरीक्षण विधि को व्यवस्थित निरीक्षण विधि कहा जाता है ।

3. सहभागी निरीक्षण विधि

इस विधि में निरीक्षणकर्त्ता जिस समय के व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण करना चाहता है, वह उस समूह में जाकर एक सदस्य के रूप में बस जाता है, वह उनमें घुल- मिल जाता है और फिर उनके व्यवहार का अध्ययन करता है ।

4. असहभागी निरिक्षण विधि

इस अध्ययन विधि में निरीक्षणकर्त्ता उस समूह के सदस्यों के साथ घुलने- मिलने के स्थान पर तटस्थ रूप से समूह के सदस्यों के व्यवहारों, संबंधों और उनकी गतिविधियों आदि का निरीक्षण कर अध्ययन करता है ।

निरिक्षण विधि के दोष –

🔸निरीक्षणकर्त्ता निरीक्षण करते- करते प्रयोज्य के साथ सौंहार्द्रपूर्ण संबंध स्थापित कर लेता है । ऐसी अवस्था में निरीक्षणकर्त्ता की मनोवृति का प्रभाव निरीक्षण पर पड़ता है ।

🔸इस विधि द्वारा प्राप्त परिणाम उस समय अधिक विश्वसनीय और वैध नहीं होते हैं जबकि समस्या का अध्ययन अनियंत्रित निरीक्षण विधि द्वारा बिना किसी पूर्व योजना के बनाए जाते हैं ।

🔸भिन्न-भिन्न निरीक्षणकर्त्ता भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकालते हैं ।

🔸इस विधि द्वारा प्राप्त परिणाम अप्रमाणिक होते हैं ।

निरीक्षण विधि का महत्व –

🔸निरीक्षण विधि का उपयोग उस समय काफी अधिक होता है जब किसी अध्ययनकर्त्ता को इस विधि के आधार पर उपकल्पनायें बनानी हो ।

🔸विधि की सहायता से पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करना सरल होता है ।

🔸इस विधि द्वारा प्राप्त परिणाम अधिक विश्वसनीय होते हैं ।

🔸नियंत्रित और वैज्ञानिक निरीक्षणों द्वारा प्राप्त परिणाम वस्तुनिष्ठ होते हैं ।

🔸वैज्ञानिक निरीक्षण में प्राप्त परिणाम विश्वसनीय, शुद्ध और सार्वभौमिक होते हैं ।

(3) प्रयोगात्मक विधि

🔸प्रयोगात्मक विधि को समाजविज्ञानियों ने प्राकृतिक विज्ञानों से लिया है ।

🔸यह विधि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक विधि है ।

🔸प्रयोगात्मक विधि वह है जिसमें चरों को योजनानुसार घटा- बढ़ाकर नियंत्रित दशाओं में निरीक्षण लेकर परिकल्पना को सत्य या असत्य सिद्ध किया जाता है ।

🔸बालकों की प्रेरणा, परिपक्वता, अधिगम, अनुबंधन, विभेदीकरण तथा संवेगात्मक अनुक्रियाओं आदि से संबंधित समस्याओं का अध्ययन इस विधि द्वारा किया जाता है ।

🔸इस विधि द्वारा कार्य कारण संबंध का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जाता है ।

🔸इस विधि के दो चर हैं – आश्रित चर, स्वतंत्र चर

🔸प्रत्येक घटना के 2 अंग होते हैं- कार्य और कारण । प्रयोगात्मक विधि में कार्य को आश्रित चर तथा कारण को स्वतंत्र चर कहते हैं ।

🔸प्रयोगात्मक विधि में कम से कम 2 अध्ययन समूह होते हैं । इनमें से एक अध्ययन समूह नियंत्रित समूह है तथा दूसरा अध्ययन समूह प्रयोगात्मक समूह कहलाता है ।

प्रयोगात्मक विधि के चरण –

१. समस्या
२. संबंधित साहित्य का अध्ययन और उपकल्पना निर्माण
३. प्रयोज्य
४. सर और प्रयोगात्मक अभिकल्प
५. उपकरण तथा सामग्री
६. नियंत्रण
७. निर्देश तथा विधि
८. परिणाम
९. व्याख्या तथा सामान्यीकरण

प्रयोगात्मक विधि के लाभ –

🔸कार्य और कारण संबंधों का अध्ययन इस विधि द्वारा जितनी शुद्धता से किया जाता है, उतना दूसरी विधि से नहीं किया जा सकता ।

🔸यह विधि उपकल्पना के परीक्षण की श्रेष्ठ विधि है ।

🔸यह सर्वाधिक वैज्ञानिक विधि है ।

🔸इस विधि द्वारा अध्ययन के आधार पर प्राप्त परिणाम विश्वसनीय, वैध तथा सर्वभोमिक होते हैं ।

प्रयोगात्मक विधि के दोष –

🔸मनोविज्ञान की समस्याओं का इस विधि से अध्ययन करते समय सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि एक व्यवहार विशेष को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों को नियंत्रित करना पड़ता है ।

🔸इस विधि द्वारा विभिन्न चरणों का प्रहस्तन कुछ अवस्था में कठिन है ।

🔸कुछ जटिल मानसिक प्रक्रिया और सामाजिक परिस्थितियों का प्रयोगशाला में अध्ययन इस विधि द्वारा कठिन है ।

🔸जब प्रयोज्यों को पता चल जाता है कि उन पर प्रयोग किया जा रहा है तब उनका व्यवहार उतना स्वाभाविक नहीं रहता है जितना कि सामान्य अवस्था में ।

🔸प्रयोज्य प्रयोगकर्त्ता के साथ सहयोग नहीं करते हैं ।

(4) विकासात्मक विधि

बाल मनोविज्ञान की विकासात्मक समस्याओं का अध्ययन करने में मनोविज्ञान प्राय: दो प्रणालियों का प्रयोग करते हैं –

(१) समकालीन अध्ययन प्रणाली

🔸हरलॉक – “जब विकास की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में कुछ योग्यताओं का मापन किया जाता है, तो उसे समकालीन अध्ययन कहा जाता है ।”

🔸इस अध्ययन प्रणाली में सर्वप्रथम भिन्न-भिन्न अवस्था के बालकों के समूह को चुना जाता है। फिर अध्ययन समस्या से संबंधित शारीरिक व मानसिक योग्यताओं के विकास के क्रमों का इन विभिन्न स्तर के बालकों में निरीक्षण किया जाता है ।

🔸इस विधि द्वारा किसी भी योग्यता या विशेषता के क्रमिक विकास के अध्ययन के साथ-साथ भिन्न-भिन्न आयु स्तरों के लिए मानक भी एकत्रित किए जाते हैं ।

🔸इस प्रणाली द्वारा क्रमिक विकास का केवल अनुमानात्मक ज्ञान प्राप्त होता है, शुद्ध ज्ञान नहीं ।

उपयोगिता –

🔸इस प्रणाली द्वारा अध्ययन कम समय और कम खर्च पर किया जा सकता है ।

🔸विभिन्न आयु स्तरों के बालकों के क्रमिक विकास का तुलनात्मक अध्ययन भी संभव है ।

🔸प्रत्येक आयु सीमा के लिए आंकड़ों के आधार पर मानक तैयार हो जाते हैं ।

🔸इस प्रणाली में अध्ययनकर्त्ता की आवश्यकता नहीं होती है । केवल एक ही प्रयोगकर्त्ता अकेले पूरे अध्ययन का संचालन और संपादन कर सकता है ।

(२) दीर्घकालीन अध्ययन प्रणाली

इस प्रणाली में एक ही आयु स्तर के बालक समूह को चुना जाता है, फिर समूह के बालकों की आयु के बढ़ने के साथ-साथ उनकी मानसिक और शारीरिक योग्यताओं के विकास क्रम का निरीक्षण और मापन किया जाता है और अंत में इन आंकड़ों के आधार पर विकास क्रम को ज्ञात किया जाता है ।

उपयोगिता –

🔸इस प्रणाली में प्रतिदर्श त्रुटियों की संभावना नहीं रहती है ।

🔸इस प्रणाली की सहायता से व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्येक बालक का अध्ययन होता रहता है ।

🔸इस विधि में विकास प्रक्रिया का शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है ।

🔸सामाजिक- सांस्कृतिक व वातावरण संबंधी परिवर्तनों का बालक के व्यवहार विकास पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन इस प्रणाली द्वारा किया जाता है ।

🔸किसी निश्चित अवधि में बालक के विकास के गुण तथा मात्रा आदि का ज्ञान इस प्रणाली द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।

विकासात्मक विधि की सीमाएँ –

🔸समय और धन का व्यय अधिक करना पड़ता है ।

🔸अगली विकास अवस्था का अध्ययनकर्त्ता को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है ।

🔸यदि अध्ययन समूह के किसी बालक के स्थानांतरण से अध्ययन में कठिनाई उत्पन्न होती है ।

🔸मूल प्रतिदर्श को स्थिर रखना कठिन होता है ।

(5) साक्षात्कार विधि

🔸इस विधि में साक्षात्कारकर्त्ता प्रत्यक्ष रूप से सूचनादाता से अध्ययन समस्या के संबंध में सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है ।

🔸इस विधि का उपयोग सहायक या सहयोगी विधि के रूप में किया जाता है ।

🔸इस विधि का उपयोग मनोविज्ञान की प्राय: सभी क्षेत्रों से संबंधित शाखाओं में किया जाता है ।

साक्षात्कार विधि के प्रकार –

१. प्रमाणिक साक्षात्कार विधि –

साक्षात्कार किस विधि द्वारा अध्ययन करते समय अध्ययन समस्या के संबंध में विभिन्न प्रकार के प्रश्न पहले से ही तैयार कर लिए जाते हैं ।

२. अप्रमाणिक साक्षात्कार विधि –

इसमें अध्ययन समस्या के संबंध में प्रश्न पहले से ही तैयार नहीं किए जाते हैं और न ही प्रश्नों की संख्या निश्चित होती है ।

साक्षात्कार विधि की सीमाएँ-

🔸अध्ययनकर्त्ता के लिए साक्षात्कार के लिए व्यक्तियों को तैयार करने में कठिनाई होती है ।

🔸जब समस्या का संबंध व्यक्तियों के संवेगात्मक पहलुओं से होता है तो लोग अपने व्यक्तिगत जीवन के संबंध में जानकारी नहीं देना चाहते ।

🔸सूचना दाता समस्या के संबंध में जो जानकारी देता है उसकी पुष्टि करना कठिन होता है ।

🔸सूचनादाता साक्षात्कारकर्त्ता से या साक्षात्कार के वातावरण से भयभीत भी हो सकता है और ऐसी अवस्था में वह सही प्रत्युत्तर नहीं देता है ।

🔸प्रयोज्य को अध्ययनकर्त्ता के सामने बोलने में कठिनाई हो सकती है ।

साक्षात्कार विधि का महत्व –

🔸इस विधि द्वारा उन समस्याओं या घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है जिनको हम देख नहीं सकते अथवा जिनका निरीक्षण विधि द्वारा अध्ययन नहीं किया जा सकता ।

🔸इस विधि द्वारा गत घटनाओं का अध्ययन सरलता से किया जा सकता है ।

🔸बाल मनोविज्ञान में विभिन्न मनोवैज्ञानिक व्याधियों के निदान में यह विधि उपयोगी है ।

(6) प्रश्नावली विधि

🔸जब अध्ययन इकाइयों का क्षेत्र विस्तृत तथा सूचनादाताओं की संख्या अधिक होती है, तब इस विधि का प्रयोग किया जाता है ।

🔸प्रश्नावली प्रश्नों की एक उद्देश्यपूर्ण सुनियोजित सूची है जिसके द्वारा अध्ययन समस्या के संबंध में अध्ययन इकाइयों से उत्तर प्राप्त किये जाते हैं तथा प्राप्त उत्तरों को व्यवस्थित करके सांख्यिकीय विश्लेषण की सहायता से परिणाम प्राप्त करते हैं ।

प्रश्नावली विधि के प्रकार –

१. अप्रतिबंधित प्रश्नावली – यह प्रश्नावली वह है जिसमें सूचना दाता पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है और वह खुलकर उत्तर दे सकता है ।

२. प्रतिबंधित प्रश्नावली – यह प्रश्नावली वह है जिसमें सूचना दाता के प्रत्युत्तर पर प्रतिबंध होता है। उसे केवल चुने हुए उत्तरों में से ही उत्तर देना होता है ।

३. चित्र प्रश्नावली – इस प्रकार की प्रश्नावली में प्रश्न चित्रों के रूप में होते हैं ।

प्रश्नावली विधि की सीमाएँ-

🔸इसका प्रयोग बहुधा शिक्षित व्यक्तियों के लिए होता है ।

🔸बहुत से सूचनादाता प्रश्नावली समय से भरकर नहीं देते हैं या खो देते हैं ।

🔸प्रश्नावली को मनमाने ढंग से भरते हैं ।

प्रश्नावली विधि की उपयोगिता –

🔸इस विधि द्वारा कम खर्च और कम समय में अधिक से अधिक अध्ययन इकाइयों का अध्ययन किया जा सकता है ।

(7) परीक्षण (मनोमिति) विधियाँ

🔸बेस्ट – “मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक उपकरण है जिसे मानव व्यवहार के किसी पक्ष के मापन एवं गणना के लिए तैयार किया जाता है ।”

🔸मनोवैज्ञानिक परीक्षण मानकीकृत, वस्तुनिष्ठ, अविश्वसनीय तथा वैध होते हैं ।

🔸मनोवैज्ञानिक परीक्षण– बुद्धि परीक्षण, अभिक्षमता परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण, व्यक्तिगत परीक्षण तथा अभिवृत्ति परीक्षाएँ ।

🔸गुडएनफ ने draw a man परीक्षण का निर्माण किया ।

🔸बालकों के व्यवहार के अध्ययन के लिए गैसेल ने अनुसूचियों का निर्माण किया ।

🔸वेश्लर ने बालकों के लिए एक बुद्धि परीक्षण का निर्माण और प्रमापीकरण किया जिससे 5 से 14 आयु वर्ग के बालकों की बुद्धि का मापन किया जाता है ।

🔸जोशी ने बालकों की बुद्धि मापन के लिए एक अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण का निर्माण किया ।

(8) वैयक्तिक इतिहास विधि

🔸बीसेंज तथा बीसेंज – ” वैयक्तिक इतिहास अध्ययन विधि एक प्रकार की गुणात्मक व्याख्या है जिसमें एक व्यक्ति, एक परिस्थिति या एक संस्था का अति सावधानी से और पूर्ण अध्ययन किया जाता है ।”

🔸यह विधि संपूर्ण परिस्थिति प्रक्रिया के वर्णन या घटनाओं के संबंध में जिसमें व्यवहार घटित होता है, पर बल देती है ।

🔸 वैयक्तिक इतिहास अध्ययन विधि में व्यक्ति, परिवार, संस्था, समूह, समिति और समुदाय का एक इकाई के रूप में अध्ययन किया जाता है ।

🔸इस विधि का उपयोग मनोविज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं के अध्ययन में किया जाता है । जैसे- सामाजिक व्याधिकीय समस्याओं का अध्ययन, समस्यात्मक बच्चों का अध्ययन, मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों का अध्ययन आदि ।

(9) समाजमिति विधि

🔸इस विधि द्वारा एक समूह के सदस्यों के बीच पायी जाने वाली स्वीकृति और अस्वीकृति, आकर्षण और विकर्षण को मापा जाता है ।

🔸समाजमिति विधि एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा समूह के सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है ।

🔸इस विधि का उपयोग समाज मनोविज्ञान में और बाल मनोविज्ञान में किया जाता है । इस विधि की सहायता से मनोबल, सामाजिक स्थिति, समूह संगठन ,सामाजिक अंत:क्रियाओं आदि से संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है ।

🔸मोरेनो – इन्होंने इस विधि का सर्वप्रथम उपयोग मनोबल मापन क्षेत्र में किया ।

मोरेनो की इस विधि में जेनकिन्स ने सुधार किया । जेनकिन्स ने इस विधि का नाम Notinating Technique रखा । इसमें इस विधि का उपयोग नेवी के व्यक्तियों के सामूहिक मनोबल के अध्ययन में किया ।

🔸इस विधि में समूह के प्रत्येक सदस्य से सामूहिक कार्यों से संबंधित कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं । जैसे- आप किस व्यक्ति के साथ काम करना अधिक पसंद करेंगे ?

समूह के प्रत्येक व्यक्ति को एक वृत्त के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है । एक व्यक्ति के वृत्त से तीर उस व्यक्ति के वृत्त तक खींचा जाता है जिसे यह पहला व्यक्ति अच्छा या स्वतंत्र विचार वाला कहता है ।

वृत्तों और तीरों के निशान से बनी चित्र को तकनीकी भाषा sociogram कहा जाता है । इससे जिस व्यक्ति को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं या जिस वृत्त पर तीर के सर्वाधिक निशान होते हैं उसे समूह का नेता कहा जाता है ।

समूह में जिस व्यक्ति को कोई नहीं चुनता है और ना ही वह व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को चुनता है तो ऐसे व्यक्ति को एकाकी कहा जाता है ।

जब एक समूह में दो या अधिक व्यक्ति एक दूसरे को चुनते हैं तो ऐसे व्यक्तियों को पारस्परिक युग्म कहते हैं ।

🔸छोटे समूह के सामूहिक मनोबल व सामूहिक संबंधी मापन के लिए यह श्रेष्ठ विधि है ।

🔸इस विधि से अध्ययन के लिए समूह का छोटा होना आवश्यक है जिससे सभी सदस्य आपस में एक- दूसरे से पूरी तरह परिचित हो ।

(10) प्रक्षेपण विधियाँ

🔸प्रक्षेपण शब्द का प्रथम प्रयोग मानसिक मनोरचनाओं के रूप में हुआ है । इस शब्द का द्वितीय उपयोग प्रक्षेपण विधियों के रूप में हुआ है ।

🔸प्रक्षेपण शब्द का मानसिक मनोरचनाओं के रूप में उपयोग का श्रेय फ्रायड को दिया जाता है ।

🔸प्रक्षेपण विधियाँ व्यक्ति की दमित इच्छाओं, व्यवहारों, विशेषताओं या भावनाओं आदि के अध्ययन की एक महत्वपूर्ण विधि है ।

🔸रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण तथा टीएमटी , प्रक्षेपण विधियों से अध्ययन करते समय सबसे प्रचलित परीक्षण है ।

प्रमुख प्रक्षेपण विधियाँ-

१. रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण – इसका निर्माण हर्मन रोर्शा ने किया । प्रक्षेपण विधियो में यह प्रमुख प्रचलित परीक्षण है । यह एक संस्कृति मुक्त परीक्षण है । इस परिक्षण का उपयोग चिकित्सा निर्देशन, विशेष रूप से बाल निर्देशन ,उपचार तथा व्यवसायिक चयन आदि में अधिक है ।

२. TAT ( Thematic Apperception Test) – इस परीक्षण का निर्माण मर्रें एवं मॉर्गन ने किया । इस परीक्षण के द्वारा सामान्य तथा न्यूरोटिक व्यक्तियों के व्यक्तित्व का अध्ययन किया जाता है। इस परीक्षण में 31 कार्ड्स होते हैं ।

३. CAT ( Children Apperception Test )- इस परीक्षण का विकास बैलक ने किया । इस परीक्षण का प्रारूप लगभग TAT समान ही है ।

इस परीक्षण की सहायता से 3 से 11 वर्ष तक के बालकों का अध्ययन किया जा सकता है । इस परीक्षण में कुल 10 कार्ड्स है । इस परीक्षण का अनुकूलन कोलकाता की उमा चौधरी ने किया ।

४. रोजेनवाइग पी.एफ.स्टडी – इसकी रचना रोजेनवाइग ने की । 1948 में बच्चों के लिए एक अलग से इस परीक्षण का प्रारूप तैयार किया गया ।

इस प्रारूप का नाम था- Children’s from of Rosenzweig’s PF Study । इस परीक्षण की विधि नियंत्रित प्रक्षेपण विधि है । इस परीक्षण के द्वारा प्रयोज्य के नैराश्य और आक्रामक स्थितियों का मापन किया जाता है ।

इस परीक्षण का भारतीय परिस्थितियों में अनुकूलन उदय पारीक तथा आर एस देव ने किया।

(11) क्षेत्र प्रयोग विधि

🔸क्षेत्र प्रयोग प्रयोगशाला आधारित प्रयोगों की तरह है ।क्षेत्र प्रयोगों में स्वाभाविक या वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में प्रयोग किए जाते हैं या प्रयोगात्मक अध्ययन किए जाते हैं । दूसरी और प्रयोगशाला आधारित प्रयोग केवल प्रयोगशाला में किए जाते हैं ।

🔸क्षेत्र प्रयोग वास्तविक सामाजिक परिस्थिति में किया गया प्रयोग है ।

🔸क्षेत्र प्रयोग मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और शिक्षाशास्त्र में बहुत लोकप्रिय हो चुके हैं ।

क्षेत्र प्रयोग विधि के लाभ –

🔸क्षेत्र प्रयोगों से जीवन या समाज की वास्तविक परिस्थितियों में अध्ययन करके विश्वसनीय परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं ।

🔸क्षेत्र प्रयोगों द्वारा जीवन की व्यवहारिक और सैद्धांतिक समस्याओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है ।

🔸क्षेत्र प्रयोग के परिणाम अधिक विश्वसनीय होते हैं ।

🔸क्षेत्र प्रयोग संपूर्ण परिस्थितियों पर आधारित होते हैं ।

क्षेत्र प्रयोग विधि की सीमाएँ –

🔸स्वतंत्र चर के प्रहस्तन में कठिनाई होती है और कई बार दोषपूर्ण परिणाम भी प्राप्त होते हैं ।

🔸नियंत्रित समूह बनाने में कठिनाई होती है ।

🔸कभी-कभी बाधक चरों के प्रभाव के कारण दूषित परिणाम प्राप्त होते हैं ।

🔸क्षेत्र प्रयोग लंबी अवधि वाले होते हैं ।

(12) अंतर्दर्शन विधि

🔸इस परंपरागत एवं प्राचीन विधि के अंतर्गत मनोवैज्ञानिक अपनी मानसिक क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए करते हैं ।

🔸यह मनोविज्ञान की प्राचीनतम अध्ययन प्रणाली हैं ।

🔸अतःर्दर्शन का अर्थ है- मनन ,आत्मचिंतन, स्वयं में देखना अर्थात अपने अंदर झांकना

🔸इस पद्धति का संबंध इंग्लैंड के विख्यात दार्शनिक लॉक से हैं ।

🔸संरचनावादी विलियम वुंट तथा इसके शिष्य टिचनर ने इस विधि को विकसित किया ।

🔸आत्मचेतना का विकसित रूप ही अंतर्दर्शन है ।

🔸इस प्रणाली में व्यक्ति जैसा अनुभव करता है वैसे ही भाव प्रकट करता है ।

लाभ या विशेषताएँ –

🔸व्यक्ति को अपनी मानसिक अवस्थाओं और मानसिक क्रियाओं का ज्ञान हो जाता है ।

🔸अपने आपको जान लेने के पश्चात् अध्यापक अपने व्यक्तित्व, व्यवहार और शिक्षण पद्धतियों में वांछित सुधार कर सकता है ।

🔸अनुभवों से संबंधित सीधा ज्ञान प्राप्त होता है ।

🔸मनोविज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में लाकर खड़ा करने का श्रेय किस पद्धति को दिया जाता है ।

🔸अंतर्दर्शन प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें विषय- सामग्री व यंत्रों की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसका उपयोग हर परिस्थिति में किया जा सकता है ।

🔸यह अत्यंत सरल विधि हैं ।

🔸यह प्रणाली किसी समस्या के तुलनात्मक अध्ययन में सहायक होती है ।

🔸यह विधि निष्कर्षों की जांच में उपयोगी होती है ।

अंतर्दर्शन विधि के दोष –

🔸निरंतर परिवर्तनशील मानसिक क्रियाओं का अंतर्निरीक्षण असंभव हो जाता है ।

🔸इस पद्धति में मन के द्वारा मन का निरीक्षण किया जाता है जो असंभव है ।

🔸इस पद्धति का प्रयोग केवल सामान्य व्यस्क व्यक्तियों पर ही किया जा सकता है ,बालकों पर लागू नहीं होती ।

🔸अंतर्दर्शन प्रणाली में व्यक्ति का मस्तिष्क परीक्षक व विषय में विभाजित हो जाता है जिससे उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है । वह अंतर्द्वंद की स्थिति में रहता है । कई परिस्थिति में उसमें कुण्ठा उत्पन्न हो जाती है ।

🔸इस प्रणाली में दो व्यक्तियों के अध्ययन के परिणाम कभी भी समान नहीं होते ।

(13) मनोविश्लेषणात्मक विधि

🔸वियना के चिकित्सक फ्रायड को इसका जन्मदाता माना जाता है ।

🔸इसके द्वारा व्यक्ति की दमित इच्छाओं को पूर्ण कर व्यवहार का उपचार करने का प्रयास किया जाता है ।

🔸व्यक्तिगत अध्ययन विधि का सर्वप्रथम प्रयोग टाइडमैन ने किया ।

(14) उत्पत्तिमुल्क (अनुवांशिक) विधि

यह दो प्रकार की होती है –

१. अनुप्रस्थ काट विधि – इस विधि के अंतर्गत यदि हमें 2,4,6,8 वर्ष के बालकों का अध्ययन करना हो तो 2 वर्ष के लिए चयनित न्यादर्शों का ही 4 वर्ष ,6 वर्ष, 8 वर्ष तक अध्ययन किया जाता है । कालानुक्रमिक विधि भी कहा जाता है ।

२. अनुदैर्ध्य काट विधि – इस विधि के अंतर्गत 2,4,6 व 8 वर्ष आयु वर्ग के अलग-अलग न्यादर्शों को लेकर एक समय में ही अध्ययन कर लिया जाता है ।

(15) तुलनात्मक पद्धति

🔸इस पद्धति में व्यवहार से संबंधित समानता और असमानताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है ।

🔸इस पद्धति का मुख्य उपयोग “सीखने की क्रिया” के अध्ययन में हुआ है ।

(16) प्रश्नावली पद्धति

🔸इस पद्धति में अध्ययन करने वाली समस्याओं से संबंधित प्रश्नों की प्रश्नावली तैयार कर लेते हैं । इसके बाद संबंधित व्यक्ति के पास हल करने हेतु भेजा जाता है । उनसे प्राप्त उत्तरों का वर्गीकरण और अध्ययन करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं ।

🔸इसके चार प्रकार हैं – बंद प्रश्नावली, खुली प्रश्नावली, सचित्र प्रश्नावली व मिश्रित प्रश्नावली

(17) उपचारात्मक पद्धति

🔸यह एक व्यक्तिगत पद्धति है जिसमें साधारणत: व्यक्तित्व या आचरण संबंधी जटिलताओं का अध्ययन करने के लिए प्रयोग किया जाता है ।

यह पद्धति निम्नलिखित समस्याओं को हल करने में उपयोगी सिद्ध हुई है –
१. बहुत हकलाने वाले बालक
२. अत्यंत पुरानी अपराधी प्रवृत्ति वाले बालक
३. पढ़ने में बेहद कठिनाई अनुभव करने वाले बालक
४. गंभीर संवेदों के शिकार होने वाले बालक

(18) सांख्यिकीय पद्धति

🔸यह एक आधुनिक एवं अत्यधिक प्रचलित पद्धति है ।

🔸इस पद्धति में प्रदत्तों के विश्लेषण में गणित की सहायता ली जाती है ,इसलिए यह पद्धति अत्यधिक विश्वसनीय व प्रमाणिक है ।

🔸व्यवहार का पूर्वानुमान लगाने में विधि सहायक है ।

bal adhyayan ki vidhiyan

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