बाल मनोविज्ञान व बाल विज्ञान – अर्थ , प्रकृति , क्षेत्र तथा उपयोगिता और महत्व

बाल मनोविज्ञान व बाल विज्ञान (child psychology in Hindi)

Child psychology in Hindi Notes

➡आधुनिक मनोवैज्ञानिक, बाल मनोविज्ञान (child psychology) के स्थान पर बाल विकास (child development) शब्द का उपयोग करने लगे हैं ।

➡17 वीं शताब्दी में कॉमेनियस मे School of infancy की स्थापना की ।

➡18 वीं शताब्दी में (1774 ई.) पेस्टोलॉजी ने बाल विकास का सर्व प्रथम वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत किया ।

➡19वीं शताब्दी में अमेरिका में बाल अध्ययन, आंदोलन चला । इस आंदोलन के जन्मदाता हॉल थे । हॉल ने Pedagogical Seminary नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ करवाया ।

➡इंग्लैंड में सली ने British Association for Child study की स्थापना की ।

➡प्रथम बालग्रह की स्थापना सन् 1887 में न्यूयार्क में बाल अपराधियों को सुधारने के लिए हुई ।

➡मानव विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत किया जाता है, उसे बाल मनोविज्ञान कहा जाता था परंतु अब मनोविज्ञान की यथा का बाल विकास कहलाती है ।

प्रेयर ने अपने ही पुत्र की जन्म से लेकर 3 वर्ष की अवस्था तक की बायोग्राफी तैयार की । प्रेयर का यह अध्ययन उसके पूर्व में किए गए अध्ययनों की अपेक्षा अधिक क्रमबद्ध था ।

मिलर और डोलार्ड ने इस दिशा में अपने अध्ययनों के आधार पर अधिगम सिद्धांत Social Learning and limitation का प्रतिपादन किया ।

ज्ञानात्मक विकास ( Cognitive Development) के क्षेत्र में पियाजे का योगदान विशेष रूप से सराहनीय है ।

➡भारत में बाल मनोविज्ञान संबंधी अध्ययनों का प्रारम्भ लगभग 1930 से हुआ । सर्वाधिक कार्य व्यक्तित्व और मापन के क्षेत्र में हुआ । कालरा, राममूर्ति, परमेश्वरन,देव पी. ,के जी अग्रवाल, सागर शर्मा ,डीएन श्रीवास्तव ने बालकों के आत्म- प्रत्यय के मापन अथवा निर्माण का अध्ययन किया ।

➡व्यक्तित्व मापन के क्षेत्र में समायोजन मापनियों का निर्माण h.s.अस्थाना, जयप्रकाश, प्रमोद कुमार, श्रीवास्तव आदि ने किया है ।

Child psychology in Hindi
Child psychology in Hindi

बाल- मनोविज्ञान और बाल- विकास का अर्थ

बर्क (2000) के अनुसार,” बाल- विकास मनोविज्ञान की एक शाखा है जिसमें व्यक्ति की जन्म पूर्व अवस्था से परिपक्वावस्था तक होने वाले सभी परिवर्तनों को स्पष्ट किया गया है ।”

क्रो और क्रो (1958) के अनुसार,” बाल- मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्भकाल के प्रारम्भ से किशोरावस्था की प्रारम्भिक अवस्था तक करता है ।”

जेम्स ड्रेवर (1968) के अनुसार,” बाल- मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्वावस्था तक विकसित हो रहे मानव का अध्ययन किया जाता है ।”

बाल विकास और बाल मनोविज्ञान में अंतर

संवेग ,रुचि, खेल, भाषा, बालकों की विभिन्न क्रियाएं ,नवजात शिशुओं की शारीरिक और मानसिक विशेषताओं का अध्ययन जिस शाखा में किया जाते थे, उसे बाल मनोविज्ञान कहा जाता था।

बाल मनोविज्ञान की अपेक्षा बाल विकास बहुत अधिक विस्तृत और व्यापक है । Child Psychology के स्थान पर Child Development शब्द का प्रयोग मुख्यत: इस कारण होने लगा कि बाल मनोविज्ञान में अधिक अनुसंधानों की आवश्यकता थी ।

बाल मनोविज्ञान का आधुनिक नाम ही बाल विकास है ।

बाल- विकास विषय की प्रकृति

(1) मनोविज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में बाल विकास –

मनोविज्ञान की इस शाखा में केवल मानव-व्यवहार का अध्ययन किया जाता है । यहाँ विकास का अर्थ- मानव की जैविक बाल विज्ञान मनोविज्ञान में विभिन्न विकास अवस्थाओं ( गर्भकालीन अवस्था, शैशवावस्था, बचपन, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था ) में मानव के व्यवहार में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है ।

(2) मनोविज्ञान में विशिष्ट उपागम के रूप में बाल विकास विषय –

मानव व्यवहारों के अध्ययन के लिए बाल विकास विषय में कई विशिष्ट उपागम या विचार पद्धतियों का उपयोग किया जाता है –

(१) प्रयोगात्मक उपागम ( Experimental Approach ) –

बाल विकास की विभिन्न समस्याओं के अध्ययन में कार्य कारण संबंध को जाने का प्रयास किया जाता है ।

(२) दैहिक उपागम (Psychological Approach)-

गर्भ कालीन शिशु और नवजात शिशुओं के व्यवहार से संबंधित समस्याओं का समाधान मुख्य रूप से इस उपागम द्वारा प्रस्तुत किया जाता है ।

(३) विकासात्मक उपागम ( Developmental Approach )-

इससे विकास की मात्रा, गति और विकास की विशिष्टताओं आदि की जानकारी अलग-अलग तथा संपूर्ण रूप में भी होती है ।

(४) व्यक्तित्व संबंधी उपागम ( Personality Approach)-

बाल विकास की समस्याओं को समझने का यह भी एक उपागम है क्योंकि बालक का व्यवहार उस बालक के व्यक्तित्व के किसी न किसी पहलू को अभिव्यक्त करता है । जन्म से ही व्यक्तित्व का निर्माण प्रारंभ हो जाता है ।

(3) एक विशिष्ट अध्ययन प्रणाली के रूप में बाल विकास विषय –

बाल विकास की विकासात्मक प्रकृति वाली समस्याओं का अध्ययन दो प्रणालियों द्वारा किया जाता है । (१) समा कालीन अध्ययन प्रणाली (२) दीर्घ कालीन अध्ययन प्रणाली

बाल विकास का क्षेत्र

(1) विकासशील मानव की आधारभूत यांत्रिकी और गतिशीलता का अध्ययन

विकास की मुख्य दो अवस्थाएं हैं –
(१) जन्म से पूर्व की विकास अवस्था – इस विकास अवस्था के मुख्य रूप से तीन भाग हैं । इनमें से प्रथम गर्भधारण से 2 सप्ताह तक की अवस्था है । दितीय 3 सप्ताह से 24 सप्ताह तक की अवस्था तथा तृतीय 24 सप्ताह से जन्म तक की अवस्था है ।

(२) जन्म के पश्चात की विकास अवस्था – इस विकास अवस्था के मुख्य रूप से पांच भाग या 5 अवस्थाएँ-

🔸शैशवावस्था (जन्म से 2 सप्ताह तक की अवस्था है )

🔸बचपन (2 सप्ताह से 2 वर्ष तक की अवस्था है )

🔸बाल्यवस्था( 2 वर्ष 11- 12 वर्ष तक अवस्था है )

🔸पूर्व किशोरावस्था ( 12 से 18 वर्ष तक की अवस्था है )

🔸पश्चात् किशोरावस्था ( 18 से 21 वर्ष तक के अवस्था है )

जन्म से पूर्व की विकास अवस्था में मुख्यतः तीन प्रकार की विकास प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है – शारीरिक विकास , गत्यात्मक विकास तथा सांवेदनिक विकास

(2) वातावरण और बालक

बल विकास में इस समस्या के अंतर्गत दो प्रकार की समस्याओं का अध्ययन किया जाता है –
(१) बालक का वातावरण पर प्रभाव
(२) बालक पर वातावरण का प्रभाव

(3) बाल व्यवहार और अंत: क्रियाएँ

एक बालक की ये अंत: क्रियाएँ सहयोग, व्यवस्थापन, समाजिक या सामूहिक संगठन प्रकार की हो सकती है । साथ ही साथ उसकी अतः क्रियाएं संघर्ष,तनाव और विरोधी प्रकार की भी हो सकती है ।

(4) मानसिक क्रियाएँ

बाल विकास में बालक की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है । जैसे- प्रत्यक्षीकरण ,चिंतन, स्मृति, साहचर्य, अधिगम तथा कल्पना ।

(5) वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन

बाल विकास में मुख्यतः शरीर रचना तथा वैयक्तिक भिन्नताएँ , योग्यताएं और वैयक्तिक भिन्नताएँ, मानसिक प्रक्रियाएँ और वैयक्तिक भिन्नताएँ,संवेग और वैयक्तिक भिन्नताएँ का अध्ययन किया जाता है ।

(6) अध्ययन प्रणालियाँ

बाल विकास में अध्ययन की मुख्यत: दो प्रणालियाँ प्रचलित है –
(१) समकालीन अध्ययन प्रणाली
(२) दीर्घकालीन अध्ययन प्रणाली

(7) व्यक्ति का निर्धारण का मूल्यांकन

बाल विकास के क्षेत्र में आज भी मूल्यांकन के लिए प्रमापीकृत परीक्षण उपलब्ध नहीं है ।

(8) असामान्य बालकों का अध्ययन

(9) समायोजन संबंधी समस्याएं

(10) विकास के नियम और सिद्धांत

(11) चरित्र का विकास

सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अधिगम का महत्व, नैतिक विकास प्रतिमान, नैतिक विकास की अवस्थाएं, नैतिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक और दुराचार आदि का अध्ययन चरित्र के विकास के अंतर्गत बाल विकास में किया जाता है ।

(12) सृजनात्मकता का विकास

सृजनात्मकता का बुद्धि से संबंध , सृजनात्मकता और व्यक्तित्व ,बालकों के लिए सृजनात्मकता का महत्व , सृजनात्मकता का विकास , सृजनात्माकता को प्रभावित करने वाले कारक आदि समस्याओं का अध्ययन बाल विकास के अंतर्गत किया जाता है ।

बाल विकास विषय की उपयोगिता और महत्व

(१) बालकों के स्वभाव को समझने में उपयोगी ।
(२) बालकों की शिक्षण और शिक्षा में उपयोगी ।
(३) बालकों के शारीरिक एवं व्यक्तित्व विकास को समझने में सहायक ।
(४) बालकों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में उपयोगी ।
(५) बालकों के व्यवहार के नियंत्रण में सहायक ।
(६) बाल निर्देशन में सहायक ।
(७) बाल व्यवहार के संबंध में पूर्वकथन करने में सहायक ।

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