प्रतापगढ़ (देवलिया) का गुहिल वंश (Pratapgarh History in Hindi) का इतिहास

आज हम प्रतापगढ़ (देवलिया) के गुहिल वंश (Pratapgarh History in Hindi) के इतिहास की बात करेंगे । जिसमें महारावत सूरजमल से लेकर महारावत रामसिंह के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे ।

Pratapgarh History in Hindi
Pratapgarh History in Hindi

प्रतापगढ़ (देवलिया) राज्य का इतिहास (Pratapgarh History in Hindi)

  • प्रतापगढ़ के शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय थे , जो मेवाड़ के गुहिल वंश की सिसोदिया शाखा से है । इन्हें महारावत कहा जाता था ।
  • महाराणा कुंभा से नाराज होकर उनके भाई क्षेमकर्ण (क्षेमसिंह) ने चित्तौड़ का परित्याग कर 1437 ई. में सादड़ी पर अधिकार कर लिया ।

महारावत सूरजमल :

  • क्षेमकर्ण के बाद रावत सूरजमल 1473 ई. में उनके उत्तराधिकारी बने ।
  • महारावत सूरजमल ने 1508 में देवलिया (देवगढ़) बसाया ।
  • उन्होंने बड़ी सादड़ी में सूरसागर तालाब बनवाया ।
  • सूरजमल ने मेवाड़ के विरुद्ध मालवा के खिलजी सुल्तानों का साथ दिया । उसने मालवा के सुल्तान नसीरुद्दीन की सेना के साथ मेवाड़ महाराणा रामलाल के विरुद्ध युद्ध किया ।
  • महारावत सूरजमल के उत्तराधिकारी पुत्र महारावत बाघसिंह ने 1534 ई. में चित्तौड़ पर मालवा के सुल्तान बहादुरशाह द्वारा आक्रमण करने पर चित्तौड़ के दुर्ग की वीरतापूर्वक रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए । इनकी छतरी आज भी चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पहले प्रवेश द्वार के पास मौजूद है ।
  • 1552 में महारावत विक्रमसिंह (बीका) कांठल एवं सादड़ी के उत्तराधिकारी बने । महारावत विक्रमसिंह ने सादड़ी के स्थान पर देवलिया को अपनी राजधानी बनाया ।
  • महारावत विक्रमसिंह ने डूँगरपुर महारावल आसकरण के विरुद्ध युद्ध में बाँसवाड़ा के शासक प्रतापसिंह का साथ दिया ।
  • महारावत विक्रमसिंह ने उस क्षेत्र में मीणों को परास्त कर काँठल क्षेत्र में सिसोदिया वंश के एक मजबूत राज्य की स्थापना की ।

महारावत हरिसिंह :

  • 1576 ईसवी के हल्दीघाटी के युद्ध में देवलिया के शासक महारावत तेजसिंह ने अपने चाचा कांधल को महाराणा प्रताप की ओर से लड़ने हेतु भेजा था ।
  • देवलिया के शासक महारावत सिंहा ( 1597-1628) ने मुगल सम्राट जहाँगीर के कोपभाजक प्रधान सेनापति महावतखाँ को सन् 1626 ईसवी के लगभग शरण दी ।
  • मेवाड़ महाराणा जगतसिंह प्रथम के षड्यंत्रों से 1628 में उदयपुर में देवलिया के शासक जसवंतसिंह एवं उनके पुत्र महासिंह मारे गए , तो उनके छोटे पुत्र देवलिया के शासक महारावत हरिसिंह ने 1633 में मुगल बादशाह शाहजहाँ के दरबार में उपस्थित होकर मुगल अधीनता स्वीकार की एवं शाही सेना की सहायता से 1633-34 के लगभग देवलिया पर पुन: अधिकार कर लिया ।
  • महारावत हरिसिंह ने 1662-63 के लगभग अपने पुत्र प्रताप सिंह एवं अमर सिंह को मुगल सम्राट औरंगजेब की सेवा में भेज दिया ।
  • मेवाड़ महाराणा राजसिंह के शासनकाल में मुगल सम्राट औरंगजेब के फरमान से देवलिया राज्य को पुन: मेवाड़ में शामिल कर दिया गया , परंतु बाद में पुन: हरिसिंह को देवलिया का स्वतंत्र शासक बना दिया गया ।

महारावत प्रतापसिंह :

  • महारावत हरिसिंह की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र प्रतापसिंह 1673 में देवलिया का शासक बना । उसे बादशाह औरंगजेब ने मनसब व जात प्रदान की । प्रतापसिंह ने बीकानेर एवं जोधपुर राज्य से वैवाहिक संबंध स्थापित किए ।
  • महारावत प्रतापसिंह ने सन् 1699 के लगभग डोडेरिया खेड़ा स्थान पर प्रतापगढ़ कस्बा बसाया ।
  • महारावत प्रतापसिंह ने देवलिया में प्रतापबाब नामक बावड़ी और बाग बनवाया ।
  • प्रतापसिंह की माता मनभावती ने देवलिया में मानसरोवर नामक सुरम्य जलाशय बनवाया ।
  • महारावत प्रतापसिंह के समय में कल्याण कवि ने ‘प्रताप प्रशस्ति‘ की रचना की ।
  • महारावत प्रतापसिंह का 1708 ईस्वी में देहांत हो गया ।

महारावत पृथ्वीसिंह :

  • महारावत प्रतापसिंह के बाद उनका पुत्र पृथ्वीसिंह 1708 ईस्वी में देवलिया का स्वामी बना ।
  • पृथ्वीसिंह की पुत्री अनूप कुँवरी से 1709 में जोधपुर नरेश अजीतसिंह का विवाह हुआ ।
  • महारावत प्रतापसिंह की 1718 ई. में मृत्यु हो जाने पर उनके पौत्र संग्रामसिंह (पहाड़सिंह का पुत्र) देवलिया की गद्दी पर बैठे , परंतु 1719 ई. में उनकी मृत्यु हो गई ।
  • संग्रामसिंह के कोई पुत्र न होने के कारण उनके चाचा उम्मेद सिंह ( महारावत पृथ्वी सिंह के पुत्र ) को देवलिया की गद्दी पर बैठाया गया , परंतु 1721 में उनका भी निधन हो गया ।
  • इनके बाद इनके बड़े भाई गोपालसिंह 1721 ई. में देवलिया के महारावत बने । उन्होंने उदयपुर महाराणा के दरबार में हाजिर होकर अपनी गद्दी को सुदृढ़ किया ।
  • महारावत गोपालसिंह ने देवरिया में गोपाल महल का निर्माण करवाया ।

महारावत सालिमसिंह :

  • महारावत गोपालसिंह का निधन 1756 में हो जाने पर उनका पुत्र सालिमसिंह देवलिया का शासक बना ।
  • सालिमसिंह कुछ समय बाद दिल्ली जाकर मुगल बादशाह शाह आलम के दरबार में हाजिर हुआ तथा बादशाह से प्रतापगढ़ में टकसाल खोलकर ‘सालिम शाही‘ सिक्के ढालने की आज्ञा प्राप्त की ।
  • 1761 में मराठा सेनापति मल्हार राव होल्कर ने प्रतापगढ़ पर आक्रमण कर उसे घेर लिया , परंतु महारावत सालिमसिंह ने कुशलतापूर्वक ने वहां से घेरा उठाकर जाने को मजबूर कर दिया ।

महारावत सामंतसिंह :

  • महारावल सालिमसिंह का अक्टूबर 1774 ई. में देहावसान हो गया तथा उनके पुत्र सांमतसिंह 7 वर्ष की आयु में महारावत बने ।
  • महारावत सामंतसिंह के शासनकाल में ही मराठा सरदार होल्कर ने खिराज वसूली हेतु प्रतापगढ़ पर घेरा डाल दिया , परंतु महारावत ने पैसे का इंतजाम न होने के कारण अपने 13 वर्षीय पुत्र दीपसिंह को होल्कर के पास गिरवी रख दिया, जो दो-तीन वर्ष बाद खिराज चुकाने पर ही वापस प्रतापगढ़ आया ।
  • मराठों से परेशान होकर महारावत सामंतसिंह ने 1804 ईस्वी में अंग्रेज सरकार के पास संधि का प्रस्ताव भेजा । 25 नवंबर 1804 को दोनों पक्षों के बीच संधि पत्र तैयार हो गया परंतु तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस ने इसे स्वीकृत नहीं किया ।
  • 5 अक्टूबर 1818 को पुन: सांमतसिंह एवं अंग्रेज सरकार के बीच संधि संपन्न हुई । इस संधि पर 7 नवम्बर 1818 को गवर्नर जनरल ने सहमति दी ।
  • महारावत सांमतसिंह ने देवलिया में रघुनाथ नामक मंदिर बनवाया । इनकी पुत्री चिमनकुँवरी ने चंद्रशेखर शिव मंदिर बनवाया ।

महारावत दलपत सिंह :

  • महारावल सामंतसिंह के दूसरे पौत्र दलपत सिंह को डूँगरपुर महारावल जसवंतसिंह द्वितीय ने गोद लेकर अपना दत्तक पुत्र बना लिया ।
  • प्रतापगढ़ महारावत सांमतसिंह ने अपनी वृद्धावस्था के कारण अपने पुत्र दीपसिंह की असमय मृत्यु हो जाने के कारण अपने पौत्र केसरीसिंह को शासन का कार्यभार सौंप दिया , परंतु केसरीसिंह की भी जल्दी मृत्यु हो गई । फलत: महारावत सांमतसिंह ने डूँगरपुर गोद गये पौत्र दलपतसिंह , जो कि डूँगरपुर महारावल के जीते जी अंग्रेजों द्वारा शासन पर बैठा दिया गया था , को बुलाकर उसे प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठा दिया । इस प्रकार दलपतसिंह देवलिया में रहते हुए दोनों राज्यों का शासन कार्य देखने लगा ।
  • जनवरी 1844 ईसवी में महारावत सांमतसिंह का निधन हो गया ।
  • 5 जनवरी 1844 को दलपतसिंह ने देवलिया के महारावत का पद ग्रहण किया । 29 जून 1848 को महारावत दलपत सिंह के पुत्र उदयसिंह का जन्म हुआ ।
  • 1857 की क्रांति में महारावत दलपत सिंह ने अपनी सेना अंग्रेजों की सहायता हेतु नीमच छावनी भेजी ।
  • महारावत दलपत सिंह ने देवलिया में सोनेलाव तलाब बनवाया तथा दलपत निवास नामक महल बनवाए ।

महारावत उदयसिंह :

  • महारावत दलपत सिंह का 30 मार्च 1864 को निधन हो जाने पर उनके पुत्र उदयसिंह 16 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठे ।
  • 1866 ई. में वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड लॉरेंस के आगरा आगमन पर महारावत उदय सिंह ने उनसे मुलाकात की ।
  • महारावत उदयसिंह ने 1867 ईस्वी में देवलिया के स्थान पर प्रतापगढ़ को अपनी राजधानी बनाया ।
  • महारावत उदयसिंह ने प्रतापगढ़ दुर्ग में उदय विलास महल बनवाये तथा रामचंद्र जी का मंदिर बनवाया ।
  • महारावत उदयसिंह के समय प्रतापगढ़ राज्य में सती प्रथा तथा कन्या वध प्रथा पर पाबंदी लगाई गई ।

महारावत रघुनाथ सिंह :

  • 15 फरवरी 1890 ईस्वी को महारावत उदयसिंह का नि:संतान निधन हो गया । महारावत उदयसिंह के कोई पुत्र न होने के कारण अरणोद के कुशलसिंह के पुत्र रघुनाथ सिंह प्रतापगढ़ की गद्दी पर बिठाए गए ।
  • महारावत रघुनाथ सिंह जी ने प्रतापगढ़ में रघुनाथ हॉस्पिटल का निर्माण करवाया तथा 1895 में उन्होंने देवलिया में भी अस्पताल बनवाया ।
  • इन्होंने अंग्रेज सरकार से प्रार्थना कर प्रतापगढ़ एवं देवलिया में पोस्ट ऑफिस की स्थापना कराई । प्रतापगढ़ से मंदसौर तक पक्की सड़क बनवाई ।
  • इन्होनें शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु समस्त राज्य की जिलेबंदी कर प्रतापगढ़ , कनौरा, बजरंगगढ़ , सागथली एवं मगरा नामक 5 जिले बनवाएं ।
  • उन्होंने न्याय संबंधी अंतिम निर्णय हेतु राज्य की सर्वोच्च अदालत ‘राजसभा’ नियत की जिसकी दो शाखाएं – (१) इजलास कामिल (२) इजलास मामूल बनाई गई ।
  • उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा हेतु प्रतापगढ़ में पिन्हें नोबल्स स्कूल की स्थापना की ।
  • महारावत रघुनाथ सिंह ने अपनी वृद्धावस्था में शासन के अधिकांश अधिकारी राजकुमार मानसिंह को सौंप दिए ।
  • 1911 में इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम के दिल्ली आने व दिल्ली दरबार आयोजित करने पर ब्रिटिश सरकार की ओर से महारावत रघुनाथ सिंह को ‘नाइट कमांड ऑफ द इंडियन एंपायर’ ( KCIE) की उपाधि प्रदान की गई ।
  • कुँवर मानसिंह का असमय ही देहांत हो गया । महारावत रघुनाथसिंह का भी 18 जनवरी 1929 को देहावसान हो गया ।
  • महारावत रघुनाथ सिंह की महारानी केसर कुँवरी ने देवलिया के राजमहलों में रसिक बिहारी का मंदिर बनवाया ।

महारावत सर रामसिंह :

  • महारावल रघुनाथ सिंह के निधन के बाद इनके पौत्र सर रामसिंह (मानसिंह का पुत्र ) प्रतापगढ़ के महारावत की गद्दी पर बैठे ।
  • उन्होंने श्री भुनेश्वरी देवी जनाना अस्पताल का निर्माण किया ।
  • 25 मार्च 1948 को प्रतापगढ़ रियासत का राजस्थान संघ में विलय हो गया ।

प्रतापगढ़ राज्य में कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथ व उनके रचनाकार :-

🔹काव्य कुसुम – महारावत प्रतापसिंह
🔹प्रताप प्रशस्ति – कवि कल्याण
🔹हरि सारस्वत – महारावत हरिसिंह
🔹भीम विलास – कवि कृष्ण अहाड़ा
🔹सत्य रूपक – कवि वृंद
🔹हरि विजय नाटक – कवि जयदेव
🔹हरि भूषण महाकाव्य – गंगाराम भट्ट
🔹हरि पिंगल – जोग कवि

महत्वपूर्ण तथ्य :-

महारावत प्रतापसिंह के दरबार में सोमजीभट्ट, मन्नाभट्ट , विश्वनाथ, जयदेव मेहता, हरिदेव मेहता , नृसिंहनगर , रामजी भाटी, विजय सूरी आदि विद्वान थे ।

हरिभूषण महाकाव्य :- कवि गंगाराम द्वारा 1653-55 के बीच लिखित यह काव्य देवलिया के महारावत हरिसिंह तक के राजाओं के इतिहास पर प्रकाश डालता है ।

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