चौहान वंश या चाहमान वंश का इतिहास

Chauhan Vansh History in Hindi

 राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति में हमने पिछली पोस्ट में गुर्जर- प्रतिहार वंश, कन्नौज के गहड़वाल वंश की बात की थी । आज हम शाकम्भरी एवं अजमेर के चौहान वंश की बात करेंगे ।

सांभर ( शाकम्भरी/ सपादलक्ष/अजमेर ) के चौहान

🔸चंद्रबरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई है । भाट चरण भी इसी बात का समर्थन करते हैं ।

🔸पृथ्वीराज विजय, हमीर महाकाव्य, हम्मीर रासो, ये ग्रंथ चौहानों को सूर्यवंशी मानते हैं ।

🔸कर्नल टॉड, डॉ स्मिथ, क्रुक आदि चौहानों को मध्य एशिया की जाती मानते हैं ।

🔸सातवीं शताब्दी में बड़ौच से प्राप्त साक्ष्य के आधार पर चौहान प्रतिहारों के सामंत थे ।

🔸चौहानों का मूल स्थान जांगलदेश में साँभर के आसपास सपादलक्ष क्षेत्र को माना जाता है । इनकी प्रारंभिक राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) थी ।

Chauhan Vansh History in Hindi
Chauhan Vansh History in Hindi

चाहमान या चौहान वंश के शासक

वासुदेव चौहान

🔸बिजोलिया शिलालेख के अनुसार सपादलक्ष के चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव चौहान नामक व्यक्ति था । जिसने 551 ईसवी के आसपास चौहान वंश की नींव डाली । इन्होंने साँभर झील का निर्माण करवाया ।

🔸उसके उत्तराधिकारी क्रमश: जयराज, विग्रहराज प्रथम, चंद्रराज प्रथम और गोपालचंद्रराज हुए ।

अजयराज प्रथम (अजयपाल )

🔸पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज प्रथम के काल में शक्ति सुदृढ़ हो गई ।

🔸अजयराज ने सातवीं सदी में साँभर कस्बा बसाया तथा अजयमेरू दुर्ग की स्थापना की थी ।

🔸अजयराज के बाद उसके पुत्र वत्सराज ने शासन किया ।

गूवक प्रथम

🔸वत्सराज का पुत्र गूवक प्रथम हुआ, जो प्रतिहार नागभट्ट का सामन्त था ।

🔸इस चौहान वंश के शासक ने सीकर जिले में जीण माता तथा हर्षनाथ मंदिर का निर्माण करवाया , यहां भगवान शिवजी की लिंगोदभव प्रतिमा है ।

🔸हर्षनाथ को चौहानों का देवता भी माना जाता है । चौहानों की इष्ट देवी जीण माता है ।

🔸गूवक प्रथम के पुत्र सिंहराज के शासनकाल में सीकर के हर्ष मंदिर का निर्माण पूरा हुआ ।

विग्रहराज द्वितीय

🔸चौहान वंश के प्रारंभिक शासकों में सबसे प्रतापी राजा सिंहराज का पुत्र विग्रहराज द्वितीय हुआ , जो लगभग 956 ईसवी के आसपास सपादलक्ष का शासक बना ।

🔸इन्होंने अन्हिलपाटन के प्रसिद्ध चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराकर तथा बड़ौच में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता का मंदिर बनवाया ।

🔸विग्रहराज के काल का विस्तृत वर्णन 973 ईसवी के हर्षनाथ के अभिलेख से प्राप्त होता है ।

अजयराज द्वितीय ( 1105-1130 ई.)

🔸चौहान वंश का दूसरा प्रतापी शासक अजयराज हुआ , जिसने 1113 ईसवी के लगभग अजयमेरू (अजमेर) बसाकर उसे अपने राज्य की राजधानी बनाया ।

🔸इन्होंने ‘श्री अजयदेव’ नाम से चाँदी के सिक्के चलाये ।

🔸उनकी रानी सोमलेखा ने भी अपने नाम के सिक्के जारी किए ।

🔸अजयराज ने अजमेर में तारागढ़ किले का निर्माण कराया, जिसमें शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह का जन्म हुआ ।

अर्णोंराज (1130-1150 ई.)

🔸अजयराज के बाद अर्णोंराज ने 1133 ईसवी के लगभग अजमेर का शासन संभाला ।

🔸अर्णोंराज ने तुर्क आक्रमणकारियों को बुरी तरह हराकर अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया ।

🔸चालुक्य शासक कुमारपाल ने आबू के निकट युद्ध में इसे हराया । इस युद्ध का वर्णन प्रबंध चिंतामणि एवं प्रबंध कोष में मिलता है ।

🔸इन्होंने पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर का निर्माण करवाया ।

🔸देवबोध तथा धर्मघोष उसके समय के प्रकांड विद्वान थे ।

🔸अर्णोंराज ने चालुक्य शासक जयसिंह की पुत्री कांचन देवी के साथ विवाह किया ।

🔸उसने पुष्कर में वराह- मंदिर का निर्माण करवाया । मुगल सम्राट जहांगीर ने वराह मंदिर की विष्णु मूर्ति को पानी में फिंकवाया ।

🔸इन्होंने महाराजाधिराज, परमेश्वर, परमभट्टारक की उपाधि धारण की ।

🔸अर्णोंराज ने अजमेर में खरतरगच्छ के अनुयायियों को भूमिदान दी गई ।

🔸आनासागर झील – इस झील का निर्माण 1137 ईस्वी में करवाया गया । जहांगीर ने यहां शाही (दौलत) बाग , जिसे वर्तमान में सुभाष उद्यान के नाम से जाना जाता है, का निर्माण करवाया । इसी उद्यान में नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने गुलाब के इत्र का आविष्कार किया । आनासागर झील के किनारे शाहजहाँ ने पाँच बारहदरियों का निर्माण करवाया ।

🔸अर्णोंराज की हत्या उसके पुत्र जगदेव ने कर दी । जगदेव कुछ समय ही शासन कर पाया, उसके बाद विग्रहराज चतुर्थ शासक बना ।

विग्रहराज चतुर्थ या बीसलदेव ( 1153-63 ई.)

🔸विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) 1153 ईस्वी में अजमेर की गद्दी पर आसीन हुए ।

🔸उसने दिल्ली, पंजाब, हिसार आदि पर अपना अधिकार कर लिया । दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया व दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया ।

🔸विग्रहराज विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण “कवि बान्धव” नाम से जाना जाता है । उन्होंने स्वयं हरिकेलि नामक संस्कृत नाटक की रचना की ।

🔸सोमदेव विग्रहराज चतुर्थ के राजकवि थे । इन्होंने ललित विग्रहराज नामक नाटक लिखा ।

🔸उन्होंने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला बनवाई । इसे मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने अढाई दिन के झोपड़े में परिवर्तित कर दिया था ।

🔸अढ़ाई दिन का झोपड़ा राजस्थान की पहली मस्जिद है ।

🔸वर्तमान टोंक जिले में बीसलपुर कस्बा एवं बीसलसागर बाँध का निर्माण भी इन्होंने ही करवाया था ।

🔸इनके काल को चौहान शासन का ‘स्वर्ण युग’ भी कहा जाता है ।

🔸विग्रहराज चतुर्थ को उसके साहित्यिक प्रेम के कारण ‘कटिबन्धु’ व ‘कवि बान्धव’ भी कहा जाता है ।

🔸इन्हीं के दरबारी इतिहासकार नरपति नाल्ह ने बीसलदेव रासो ग्रंथ की रचना की है ।

🔸विग्रहराज के पश्चात् क्रमश: अपरगांग्य, पृथ्वीराज द्वितीय , सोमेश्वर शासक हुए ।

पृथ्वीराज तृतीय / राय पिथौरा ( 1177-1192 ई.)

🔸पृथ्वीराज चौहान तृतीय सोमेश्वर की मृत्यु के बाद 1177 ईस्वी में अजमेर का शासक बना ।

🔸पृथ्वीराज तृतीय जब गद्दी पर बैठा तो उस समय उसकी आयु मात्र 11 वर्ष थी । अत: कलचुरी की राजकुमारी जो पृथ्वीराज तृतीय की माता (कर्पूर देवी) ने राजकार्य को संभाला ।

🔸पृथ्वीराज का जन्म गुजरात के अहिलवाड़ा/ अंहिलपाटन में 1166 ईसवी को हुआ ।

🔸प्रारंभिक काल में सेनाध्यक्ष भुवनमल ने पृथ्वीराज तृतीय को सुरक्षित रखा ।

🔸पृथ्वीराज चौहान के समय ही ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर आए थे ।

🔸पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंद्रबरदाई व जयानक थे । जयानक द्वारा पृथ्वीराज विजय की रचना की गई । चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज रासो की रचना की गई ।

🔸चंद्रबरदाई के ग्रंथ पृथ्वीराज रासो के अनुसार कन्नौज के शासक जयचंद गहड़वाल की पुत्री संयोगीता को स्वयंवर से आल्हा और उदा सेनापतियों की मदद से अपहरण कर लिया ।

🔸पृथ्वीराज तृतीय को दलपुंगल या विश्वविजेता भी कहा जाता है ।

🔸पृथ्वीराज द्वारा विद्वानों को प्रोत्साहित करने के लिए अजमेर में कला साहित्य विभाग की स्थापना की ।

🔸इनके प्रमुख विद्वान – वागीश्वर, विद्यापति गौड़, जनार्दन, विश्वरूप, पृथ्वीभट्ट, चंद्रबरदाई और जयानक ।

पृथ्वीराज तृतीय के प्रमुख सैनिक अभियान व विजयें –

(1) नागार्जुन एवं भण्डानकों का दमन

पृथ्वीराज के राजकाज संभालने के कुछ समय बाद उसके चचेरे भाई नागार्जुन ने विद्रोह कर दिया । अत: पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम अपने मंत्री कैमास की सहायता से सैन्य बल के साथ उसे पराजित कर गुडापुरा एवं आसपास का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिया । इसके बाद 1182 ईस्वी में पृथ्वीराज ने भरतपुर- मथुरा क्षेत्र के भण्डानकों के विद्रोह का अंत किया ।

(2) महोबा के चंदेलों पर विजय

पृथ्वीराज ने 1182 ईस्वी में ही महोबा के चंदेल शासक परमाल देव को हराकर उसे संधि के लिए विवश किया एवं उसके कई गांव अपने अधिकार में ले लिए ।

(3) चालुक्यों पर विजय

सन् 1184 के लगभग गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार एवं पृथ्वीराज की सेना के मध्य नागौर का युद्ध हुआ , जिसके बाद दोनों में संधि हो गई एवं चौहानों की चालुक्यों से लंबी शत्रुता का अंत हुआ ।

(4) कन्नौज से संबंध

पृथ्वीराज के समय कन्नौज पर गहड़वाल शासक जयचन्द का शासन था । जयचंद एवं पृथ्वीराज दोनों की राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षाओं ने उनमें आपसी वैमनस्य उत्पन्न कर दिया था ।

उसके बाद उसकी पुत्री संयोगिता को पृथ्वीराज द्वारा स्वयंवर से उठाकर ले जाने के कारण दोनों की शत्रुता और बढ़ गई थी । इसी वजह से तराइन के युद्ध में जयचंद ने पृथ्वीराज की सहायता न कर मोहम्मद गौरी की सहायता की ।

पृथ्वीराज एवं मुहम्मद गोरी –

पृथ्वीराज के समय भारत के उत्तर- पश्चिम में गौर प्रदेश पर शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का शासन था । उसने गजनी के शासक सुल्तान मलिक खुसरो को हराकर गजनवी द्वारा अधिकृत सभी क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था ।

मुहम्मद गौरी धीरे-धीरे अपने राज्य का विस्तार करता जा रहा था । सन् 1178 में उसने पंजाब, मुल्तान एवं सिंध को जीतकर अपने अधिकार कर लिया था ।

तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)-

भटिंडा (हरियाणा) के पास स्थित तराइन नामक स्थान पर मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के मध्य युद्ध हुआ ।

इसमें दिल्ली के गर्वनर गोविंदराज ने मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया । पृथ्वीराज ने इस विजय के बाद भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा न कर मोहम्मद गौरी व उसकी सेना को जाने दिया ।

इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का सेनापति खाण्डेराव था ।

तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)-

1192 ईस्वी में ही गौरी ने पृथ्वीराज से अपनी हार का बदला लेने हेतु तराइन का द्वितीय युद्ध किया , जिसमें मुहम्मद गौरी की विजय हुई तथा पृथ्वीराज को बंदी बना लिया गया ।

तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजित होकर बंदी बना लिए जाने पर उसे छुड़ाने के लिए आबू नरेश जैतसिंह की पुत्री अच्छन कुमारी युद्ध भूमि में गई और वही मारी गई ।

हम्मीर महाकाव्य में गौरी द्वारा पृथ्वीराज को कैद करना और अंत में उसको मरवा देने का उल्लेख है ।

पृथ्वीराज रासो ग्रंथ में यहां पृथ्वीराज चौहान का अंत दिखाया गया है , नेत्रहीन पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण चलाकर मोहम्मद गौरी की हत्या की ।

चंद्रबरदाई द्वारा इस संबंध में पृथ्वीराज को निम्न दोहा सुनाया गया –

” चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ।
ताँ ऊपर सुल्तान है, मत चूकै चौहान ।।”

इस घटना के बाद दोनों ने आत्महत्या कर ली । पृथ्वीराज चौहान तृतीय की छतरी काबुल (गजनी) में बनी हुई है ।

पृथ्वीराज स्मारक अजमेर में तारागढ़ के किले में स्थित हैं ।

तराइन के दोनों युद्ध का विस्तृत विवरण कवि चंदबरदाई के “पृथ्वीराज रासो”, हसन निजामी के “ताजुल मासिर” एवं सिराज के “तबकात-ए- नासिरी” में मिलता है ।

पृथ्वीराज रासो
चंदबरदाई द्वारा रचित महाकाव्य । रासो के पिछले भाग को चंद्रबरदाई के पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया ।पृथ्वीराज रासो की भाषा पिंगल है । पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली रचना, महाकाव्य होने का सम्मान प्राप्त है । इसमें 10,000 से अधिक छंद है और तत्कालीन प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है ।

पृथ्वीराज तृतीय की मृत्यु के साथ ही साँभर के चौहान राजपूत साम्राज्य का अंत हो गया ।

पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद उसके पुत्र गोविंदराज ने रणथम्भौर में चौहान वंश की स्थापना की ।

Chauhan Vansh History in Hindi

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