राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति-गुर्जर प्रतिहार वंश

Gurjar Pratihar Vansh History in Hindi

 राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति

राजपूत को आबू पर्वत पर वशिष्ठ के अग्निकुंड से उत्पन्न हुआ मानते हैं । यह सिद्धांत चंद्रबरदाई के पृथ्वीराज रासो पर आधारित है तथा प्रतिहार, चालुक्य, चौहान और परमार राजपूतों का जन्म इससे माना जाता है ।

🔸कर्नल टॉड के अनुसार राजपूत शक- कुषाण तथा हुण आदि विदेशी जातियों की संतान थे ।

🔸डॉ ईश्वरी प्रसाद तथा डीआर भंडारकर भी राजपूतों को विदेशी मानते हैं ।

🔸वी डी चट्टोपाध्याय के अनुसार राजपूत सामाजिक- आर्थिक प्रक्रिया की उपस्थित थे ।

🔸जी एच ओझा, सीवी वैद्य तथा अन्य कई इतिहासकार यही मानते हैं कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों की संतान हैं ।

Gurjar Pratihar Vansh History in Hindi
Gurjar Pratihar Vansh

प्रमुख राजपूत वंश-
(1) गुर्जर प्रतिहार वंश
(2) गहड़वाल (राठौड़) राजवंश
(3) चाहमान या चौहान वंश
(4) परमार वंश
(5) चंदेल वंश
(6) सोलंकी वंश
(7) कलचुरी- चेदि राजवंश
(8) सिसोदिया वंश

आज हम बात करेंगे गुर्जर प्रतिहार वंश के बारे में जो निम्न प्रकार है –

गुर्जर- प्रतिहार वंश

उत्तरी पश्चिमी भारत में गुर्जर प्रतिहार वंश का शासन मुख्यत: आठवीं से दसवीं सदी तक रहा । प्रारम्भ में इनकी शक्ति का मुख्य केंद्र मारवाड़ था । उस समय राजपूताना का यह क्षेत्र गुर्जरात्रा (गुर्जर प्रदेश) कहलाता था । गुर्जर क्षेत्र के स्वामी होने के कारण प्रतिहारों को गुर्जर- प्रतिहार कहा जाने लगा था ।

🔸इस वंश का संस्थापक ‘हरिश्चंद्र’ था, परंतु वास्तविक संस्थापक नागभट्ट प्रथम(730-756 ई.) को माना जाता है ।

🔸राजस्थान में गुर्जर- प्रतिहारों की शाखाओं का अस्तित्व था – (१) मंडोर शाखा (२) भीनमाल (जालौर) शाखा

गुर्जर- प्रतिहारों के प्रमुख शासक –

(1) नागभट्ट प्रथम

🔸राजस्थान में गुर्जर- प्रतिहारों की प्रारंभिक राजधानी मंडोर (जोधपुर) थी । प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम ने आठवीं शताब्दी में भीनमाल पर अधिकार कर उसे अपनी राजधानी बनाया ।

🔸नागभट्ट प्रथम ने अपनी दूसरी राजधानी उज्जैन को बनाया ।

🔸दन्तिदुर्ग– नागभट्ट प्रथम ने इस राष्ट्रकूट वंश के शासक को हिरण्य गर्भदान यज्ञ करने हेतु उज्जैन में आमंत्रित किया ।

🔸इन्होंने उज्जैन को अपने अधिकार में कर लिया एवं उज्जैन इनकी शक्ति का प्रमुख केंद्र हो गया ।

🔸इसने सिन्ध की ओर से राजस्थान पर होने वाले अरब आक्रमण को रोका ।

🔸ग्वालियर प्रशस्ति में उसे ‘म्लेच्छों का नाशक’ बताया गया है ।

🔸इनके दरबार को नागावलोक दरबार कहते थे ।

🔸उपनाम –
(१) क्षत्रिय ब्राह्मण
(२) राम का प्रतिहार
(३) नारायण की मूर्ति का प्रतीक
(४) इंद्र के दंभ का नाश करने वाला
(५) नागावलोक

🔸नागभट्ट प्रथम के उत्तराधिकारी कक्कुक एवं देवराज थे, परंतु इनका शासनकाल महत्वपूर्ण नहीं था ।

(2) वत्सराज (778-795 ई.)

🔸प्रतिहार वंश का वास्तविक संस्थापक, इसे प्रतिहार राज्य की नींव डालने वाला शासक कहा जाता है ।

🔸वत्सराज को “रणहस्तिन्” (युद्ध का राजा) तथा जयवराह कहा जाता है ।

🔸त्रिकोणात्मक संघर्ष वत्सराज के समय में प्रारंभ हुआ था ।

🔸भीनमाल (जालौर ) में वत्सराज ने राजसूय यज्ञ किया ।

🔸पाल शासक धर्मपाल व वत्सराज के मध्य मुंगेर युद्ध हुआ, जिसमें वत्सराज विजय रहा ।

🔸इसने राष्ट्रकूट शासक ध्रुव प्रथम को भी पराजित किया ।

🔸जोधपुर के ओसियाँ में वत्सराज ने एक सरोवर तथा महावीर स्वामी ( पश्चिम भारत का सबसे प्राचीन जैन मंदिर ) के मंदिर का निर्माण करवाया ।

🔸कुवलय माला ग्रंथ की रचना उद्योतन सूरी (778 ई.) में की।

🔸हरिवंश पुराण की रचना जिनसेन सूरी ने की ।

(3) नागभट्ट द्वितीय ( 815-833 ई.)

🔸वत्सराज का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय 815 में गद्दी पर बैठा ।

🔸उसने 816 ईस्वी में कन्नौज पर आक्रमण कर चक्रायुद्ध ( धर्मपाल द्वारा नामजद शासक ) को पराजित किया तथा कन्नौज को प्रतिहार वंश की राजधानी बनाया ।

🔸100 वर्षों से चले आ रहे त्रिपक्षीय संघर्ष को समाप्त किया ।

🔸नागभट्ट द्वितीय के वंशज गुर्जर प्रतिहार कहलाए ।

🔸बकुला अभिलेख में नागभट्ट द्वितीय को ‘परमभट्ठारक महाराजधिराज परमेश्वर’ कहा गया है ।

🔸ग्वालियर अभिलेख में नागभट्ट द्वितीय को कर्ण की उपाधि प्रदान की गई ।

🔸नागभट्ट द्वितीय को राष्ट्रकूट सम्राट गोविंद तृतीय ने हराया था ।

🔸सन् 833 ईस्वी में नागभट्ट द्वितीय ने गंगा में जल समाधि ली ।

(4) रामभद्र (833-836 ई.)

नागभट्ट द्वितीय के बाद उसके पुत्र रामभद्र ने 833 ईस्वी में शासन की बागडोर संभाली , परंतु उसके अल्प शासनकाल में कोई उल्लेख कार्य नहीं हुआ बल्कि प्रतिहारों की क्षति क्षीण हुई ।

(5) मिहिर भोज ( 836-885 ई.)

🔸रामभद्र के उत्तराधिकारी मिहिरभोज 836 ईसवी में राजगद्दी संभाली ।

🔸प्रतिहार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रतापी राजा मिहिर भोज था ।

🔸मिहिर भोज ने अपनी राजधानी कन्नौज में बनायी थी । वह विष्णु भक्त था , उसने विष्णु के सम्मान में आदि वराह की उपाधि ग्रहण की ।

🔸मिहिर भोज के संबंध में जानकारी के स्रोत – कल्हण की राजतरंगिणी , ग्वालियर प्रशस्ति व अरब यात्री सुलेमान का विवरण ।

🔸अरब यात्री सुलेमान ने (851ई.) मिहिर भोज के कुशल प्रशासन एवं शक्तिशाली सेना की प्रशंसा की है । उसने “हिंदुस्तान को काफिरों का देश” कहा है ।

🔸मिहिरभोज की उपाधियाँ – प्रभास, आदिवराह, सार्वभौम, मालवा चक्रवर्ती ।

🔸राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने मिहिर भोज के दक्षिणी क्षेत्रों में विजय अभियान पर रोक लगाई ।

🔸मिहिर भोज ने चांदी के द्रम्म नामक सिक्के चलाये जिनके एक तरफ वराह की आकृति थी ।

🔸मिहिर भोज को निम्न रूप में भी जाना जाता है – (१) अरबों का अमित्र (२) इस्लाम का शत्रु (३) इस्लाम की दीवार

(6) महेंद्रपाल प्रथम ( 885-910 ई.)

🔸मिहिर भोज के बाद उसका पुत्र महेंद्र पाल प्रथम प्रतिहार वंश का शासक बना ।

🔸वह विद्वानों का उदार संरक्षक था, उसके दरबारी साहित्यकार राजशेखर थे । राजशेखर ने कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, बाल रामायण, बाल भारत आदि ग्रंथों की रचना की थी ।

🔸साहित्यकार राजशेखर ने अपने ग्रंथों में महेंद्र पाल प्रथम को “निर्भय नरेश” कहा है ।

🔸उपनाम ➡ रघुकुल चूड़ामणि , महीशपाल, महिंद्रायुध, निर्भयराज ।

🔸उपाधियाँ ➡ परमभट्टारक, परमभागवत, परमेश्वर।

(7) महिपाल प्रथम (912-944 ई.)

🔹उपनाम – विनायकपाल, हेरम्भपाल ।

🔹राष्ट्रकूट नरेश इंद्र तृतीय ने प्रतिहारों को हराकर कन्नौज को नष्ट कर दिया ।

🔹महिपाल प्रथम के समय अरब यात्री ‘अल मसूदी’ उसके राज्य में यात्रा करने आया था ।

🔹यह गुर्जरों का अंतिम प्रभावशाली राजा था ।

(8) राज्यपाल

🔹गुर्जर प्रतिहार वंश के शासक राज्यपाल के समय 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया , राज्यपाल डर कर भाग गया ।

🔹उसके इस कायरतापूर्ण कार्य के फलस्वरूप चन्देल राजा गंड तथा उसके पुत्र विद्याधर ने उस पर आक्रमण कर उसे मार डाला ।

🔹1019 ईस्वी में राज्यपाल के पुत्र त्रिलोचनपाल को भी महमूद ने पराजित किया ।

(9) यशपाल

🔹गुर्जर प्रतिहार वंश का अंतिम शासक ।

त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripatrite Struggle)

आठवीं शताब्दी के मध्य में भारत के तीन कोनों में तीन शक्तिशाली राजवंशों का उदय हुआ । दक्षिण में राष्ट्रकूट , पूर्व में पाल एवं उत्तरी भारत में गुर्जर- प्रतिहार

कन्नौज पर आधिपत्य के लिए इन तीनों महाशक्तियों के मध्य हुए संघर्ष को “त्रिपक्षीय संघर्ष” कहा जाता है । इसकी शुरुआत प्रतिहार नरेश वत्सराज ने कन्नौज के शासक इंद्रायुध को पराजित करके की एवं अन्तत: प्रतिहार इसमें सफल हुए ।

प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय ने 816 ईसवी में कन्नौज के शासक चक्रायुद्ध को हराकर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया एवं 100 वर्ष से चले आ रहे इस संघर्ष को विराम दिया । यह संघर्ष लगभग 100 वर्ष तक चला था

महत्वपूर्ण बिंदु –

🔹प्रतिहारों की तुलना मौर्य, गुप्त व मुगल शासकों से की जाती है । उन्होंने अरब आक्रमणकारियों से मुकाबला कर कुछ समय के लिए भारत की संभावित दासता को टाल दिया ।

🔹ऐहोल अभिलेख– बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के इस अभिलेख में गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख हुआ है ।

🔹अग्निकुंड से उत्पन्न राजपूतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध वंश प्रतिहारों का था ।

🔹प्रतिहार शासकों में एकमात्र वीणा वादक झोट प्रतिहार शासक था ।

🔹कक्कुक ने मंडोर (जोधपुर) व रोहिसकूप नगर (जोधपुर) में 2 स्तंभों का निर्माण कराया जिन्हें घटियाला लेख कहते हैं ।

🔹प्रारंभिक प्रतिहार शासकों की जानकारी भोज प्रतिहार की ग्वालियर प्रशस्ति, उद्योतन सूरी रचित “कुवलयमाला”, पुरातन प्रबंध संग्रह एवं हरिवंश पुराण से मिलती है ।

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