रणथम्भौर के चौहान वंश

Ranthambore ke Chauhan Vansh

 राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति में हमने पिछली पोस्ट में शाकम्भरी एवं अजमेर के चौहान वंश की बात की थी । आज हम रणथंबोर के चौहान वंश की बात करेंगे ।

Ranthambore ke Chauhan Vansh
Ranthambore ke Chauhan Vansh

रणथम्भौर के चौहान

गोविंद राज इस वंश का प्रथम संस्थापक था, जो पृथ्वीराज तृतीय का पुत्र था । इतसे रणथंबोर में 1194 ईस्वी में चौहान वंश की नींव डाली ।

उसके उत्तराधिकारी क्रमश: बाल्हण,प्रल्हादन और वीर नारायण थे । वीर नारायण को इल्तुतमिश की सेना में सफल मुकाबला करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ परंतु सुल्तान ने उसका दिल्ली में वध करवा दिया ।

वीर नारायण के उत्तराधिकारी वागभट्ट ने पैतृक राज्य को बचाया । वागभट्ट के पुत्र जैत्रसिंह ने नासिरुद्दीन द्वारा भेजी गई सेना का सफलतम मुकाबला किया, परंतु कर देने के लिए बाध्य होना पड़ा ।

हम्मीर देव ( 1282-1301 ई.)

हम्मीर देव जैत्रसिंह का पुत्र था, जिसका 1282 ई. में राज्यारोहण हुआ । रणथंबोर के शासकों में हम्मीर का नाम सर्वोपरि हैं । यह जलालुद्दीन व अलाउद्दीन खिलजी के समकालीन थे ।

नयचन्द्र सूरि द्वारा रचित “हम्मीर महाकाव्य” तथा चंद्रशेखर द्वारा रचित “हम्मीर हठ” हम्मीर के बारे में जानने के ऐतिहासिक मुख्य स्रोत हैं ।

दिल्ली सल्तनत काल का 1290 ई. में जलालुद्दीन खिलजी गद्दी पर बैठा । उसने रणथंबोर पर 2 बार आक्रमण किए लेकिन वह असफल रहा । 1291-92 ई. में रणथम्भौर पर आक्रमण किया , दुर्ग की अभेद्यता व हम्मीर की तैयारियों से घबराकर यह कह कर लौट गया कि ” ऐसे 10 किलो को भी मैं मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता ।

अमीर खुसरो और बरनी , हम्मीर महाकाव्य ( नयनचन्द्र सूरि), हम्मीर रासो ( सांरगधर), हम्मीर हठ ( चंद्रशेखर) नामक काव्य घटनाओं से हम्मीर का सल्तनत के मुसलमानों के साथ संघर्ष का पता लगता है ।

अलाउद्दीन 1296 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बैठा । मंगोलों के नेता मुहम्मदशाह व केहब्रू को हम्मीर द्वारा शरण देना अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर पर आक्रमण का कारण बना ।

रणथम्भौर पर पहला आक्रमण अलाउद्दीन ने 1299 ईसवी उलुगखाँ के नेतृत्व में किया । हम्मीर ने अपने दो सैनिक अधिकारी भीम सिंह और धर्म सिंह को भेजा तथा वे इस अभियान में सफल भी रहे, लेकिन लौटती सेना पर शाही सेना ने धावा बोल दिया, जहाँ भीमसिंह वीरगति को प्राप्त हो गया ।

अलाउद्दीन ने उलुगखाँ को एक बड़ी सेना के साथ दोबारा भेजा । उलुगखाँ ने ‘रणथम्भौर के मार्ग की कुंजी‘ कहलाने वाले झाईन पर आक्रमण किया तो था उस किले को जीत लिया ।

अलाउद्दीन ने हम्मीर देव के सेनापति रतिपाल व रणमल को प्रलोभन देकर, अपनी ओर मिला लिया तथा रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया ।

11 जुलाई 1301 ई. को हम्मीर “तिरिया-तेल हम्मीर-हठ चढ़े न दूजी बार” कथन के अनुरूप आचरण करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ । रानी रंगदेवी के नेतृत्व में रणथम्भौर दुर्ग में जौहर हुआ ।
रणथम्भौर दुर्ग से ‘देवलदे रो आत्मोत्सर्ग’ की घटना जुड़ी हुई है ।

इस युद्ध में अमीर खुसरो अलाउद्दीन की सेना के साथ था । अमीर खुसरो ने रणथम्भौर की विजय के बाद कहा की ” आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया ।

हम्मीर के साथ रणथम्भौर चौहानों का राज्य समाप्त हो गया ।

हम्मीर धर्मसहिष्णुता था । विजयादित्य ‘हम्मीर’ का राज्य सम्मानित कवि था तथा राघवदेव उसका गुरु था ।

रणथम्भौर दुर्ग में हम्मीर देव ने 32 खंभों की छतरी बनवाई, जिसे ‘न्याय की छतरी‘ भी कहते हैं । इसने ‘पद्लमा तालाब’ का निर्माण करवाया ।

हम्मीर देव के बलवान शिलालेख में दो ‘कोटी-यजनों’ का उल्लेख मिलता है, इसका पुरोहित विश्वरूप था ।

हम्मीर ने अपने जीवन काल में 17 युद्ध लड़े थे जिनमें से 16 युद्धों में वह विजयी रहा । 17वें तथा अंतिम युद्ध में वह दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की सैना से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ ।

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