वैदिक काल या वैदिक सभ्यता

वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति ( vaidik sabhyata in hindi)

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Vaidik Sabhyata Ncert Notes in Hindi

सिंधु सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता के पतन के पश्चात सैधव प्रदेश में आर्यों की एक नवीन सभ्यता का विकास हुआ, जिसे इतिहास में वैदिक सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है । वैदिक सभ्यता के निर्माता आर्य थे । आर्यों के मूल निवास के संबंध में निम्न सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है –

(1) यूरोपीय सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार आर्यों का मूल निवास स्थान यूरोप था । इसका प्रतिपादन सन् 1786 ई. में सर विनियम जोन्स ने किया ।

(2) जर्मन के प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर के अनुसार आर्य मध्य एशिया से आए थे ।

(3) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने आर्कटिक प्रदेश (उत्तरी ध्रुव) को आर्यों का मूल स्थान बताया है ।

(4) डॉ. गंगानाथ झा के अनुसार आर्यों का आदि देश ब्रह्मर्षि देश भारत था ।

(5) स्वामी दयानंद सरस्वती ने तिब्बत को आर्यों का आदि देश माना है ।

 

विद्वान आर्यों का मूल निवास स्थान
प्रो. मैक्समूलरमध्य एशिया
बाल गंगाधर तिलकउत्तरी ध्रुव
डॉ अविनाश चंद्र दाससप्त सैधव प्रदेश
गंगानाथ झाब्रह्मर्षि देश
नेहरिंगदक्षिण रूस
गाइल्स महोदयडेन्यूब नदी घाटी
प्रो. पेन्काजर्मनी के मैदानी भाग
दयानंद सरस्वतीतिब्बत

 वैदिक काल ( Vedic Civilization in Hindi)

वैदिक काल को दो भागों में विभाजित करते हैं –
1. पूर्व वैदिक काल या ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.)
2. उत्तर वैदिक काल (1200-800 ई.पू.)

1. पूर्व वैदिक काल या ऋग्वैदिक काल

ऋग्वैदिक आर्य अपनी निवास के लिए सर्वत्र ‘सप्तसिंधव’ शब्द का प्रयोग करते हैं । ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख है , जिनमें पूर्व में गंगा पश्चिम में कुंभा (काबुल) नदी शामिल है । यमुना ,सरस्वती, सतलज, रावी ,झेलम और सिंधु जैसी सभी नदियां गंगा और काबुल के मध्य बहती हुई बताई गई है ।

ऋग्वैदिक भूगोल में आज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा ,पंजाब, राजस्थान, गुजरात, संपूर्ण पाकिस्तान और दक्षिणी अफ़गानिस्तान शामिऋग्वैदिक

इस ऋग्वैदिक काल में आर्यों के कुछ राज्य गणतंत्रात्मक थे तो कुछ राजतंत्रात्मक ।

ऋग्वैदिक काल की प्रमुख विशेषताएं :-

1. वर्ण व्यवस्था :- ऋग्वैदिक कालीन समाज वर्णों में बंटा हुआ था । ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में उल्लेख है कि परम पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए ।

2. परिवार :- यह समाज की सबसे छोटी इकाई थी । समाज पितृसत्तात्मक था ।

3. विवाह :- ऋग्वैदिक समाज में विवाह एक पवित्र संस्कार माना जाता था । एक विवाह प्रथा का ही प्रचलन था, बहुविवाह अपवाद था ।

4. नारी का स्थान :- ऋग्वैदिक काल में नारी के प्रति सम्मान एवं आदर का भाव दिखाई देता है । पर्दा- प्रथा नहीं थी । विधवा अपने मृतक पति के छोटे भाई (देवर) से विवाह कर सकती थी । सभी धार्मिक तथा सामाजिक उत्सव में पत्नी पति की भागीदार बनती थी ।

5. शिक्षा :- ऋग्वैदिक काल में गुरु का घर विद्यालय होता था , जहां वह अपने शिष्यों को सभी विषयों की शिक्षा देता था ।

6. खानपान :- ऋग्वैदिक आर्यों का भोजन सरल, साधारण एवं पुष्टिकारक था । उनके भोजन में दूध ,दही, मक्खन, फल, सब्जी आदि की प्रमुखता थी । मछली, पक्षी और वन्य जंतु का मांस खाया जाता था । कुछ लोग ‘सुरा-पान’ भी करते थे । ‘सोमरस’ नामक अन्य पेय का भी प्रचलन था ।

7. वस्त्राभूषण :- ऋग्वैदिक आर्यों की वेशभूषा साधारण थी । उनके वस्त्र सूत, ऊन और मृगचर्म के बने होते थे ।

8. आर्थिक जीवन :- ऋग्वैदिक काल में आर्थिक जन-जीवन कृषि ,पशुपालन और वाणिज्य- व्यापार पर निर्भर था ।

9. कृषि :- ये लोग खाद्यान्नों में जौ, गेहूं ,मसूर ,उड़द ,तिल धान आदि का उत्पादन करते थे । खेती में सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भर थे । ऋग्वेद में नहरों का भी उल्लेख मिलता है ।

10. पशुपालन :- गाय और बैल संपत्ति के प्रतीक समझे जाते थे । गाय के अलावा भैंस ,भेड़ ,बकरी भी पाली जाती थी । आर्य समाज में घोड़े का विशेष महत्व था ।

11. व्यापार :- ऋग्वैदिक काल में व्यापारियों को ‘वणिक’ कहा जाता था । वस्तु-विनिमय लेनदेन का माध्यम था ।

12. धार्मिक जीवन :- ऋग्वैदिक काल में आर्य लोगों के लगभग सभी देवी देवता ,प्राकृतिक शक्तियों से ही संबंधित थे । इस काल में सबसे प्रमुख देवता इंद्र थे ।

प्राचीननामआधुनिक नामप्राचीननामआधुनिक नाम
उर्वराजूते हुए खेतसीताहल से बनी नालियां
लांगलहलअवतकुआँ
बृकबैलकीवाशहलवाह
करीषगोबर की खादपर्जन्यबादल

2. उत्तरवैदिक काल

ऋग्वेद की संहिता के अतरिक्त शेष वैदिक साहित्य में जिस सभ्यता संस्कृति का उल्लेख है ,वह उत्तरवैदिक कालीन सभ्यता संस्कृति है ।

उत्तर वैदिक काल की प्रमुख विशेषताएं :-

(1) राजनीतिक जीवन :- इस काल में जनपद राज्यों की स्थापना की गई । इस काल में निम्नलिखित प्रमुख राज्यों के नाम मिलते हैं – कुरू, पांचाल, गांधार, केकय, मद्र मत्स्य, काशी, कौशल ,कलिंग ,अवन्ति, विदेह, मगध, विदर्भ, अश्भक,मूलक आदि ।

इस काल में राजा का पद अब स्थायी व वंशानुगत हो चला था । राजा को देवी उत्पत्ति की प्रतिष्ठा दी जाने लगी थी ।

(2) सामाजिक जीवन :- इस काल में वर्ण जन्म पर आधारित होकर वंशानुगत होने लगा था और यह धीरे-धीरे जातियों के रूप में बदलने लगा था ।

उत्तर वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था का विकास हुआ । सामाजिक धार्मिक व्यवस्थाकरों ने मानव जीवन के चार पुरुषार्थ – धर्म ,अर्थ ,काम व मोक्ष की क्रमश: प्राप्ति के लिए मनुष्य जीवन के चार भागों की कल्पना की जो ‘आश्रम व्यवस्था’ कहलायी ।

आश्रम – ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ ,वानप्रस्थ एवं सन्यास

ब्रह्मचर्य आश्रम – 25 वर्ष की आयु तक
गृहस्थ आश्रम -26 से 50 वर्ष की आयु तक
वानप्रस्थ आश्रम – 51 से 75 वर्ष की आयु तक
सन्यास आश्रम– 76 से 100 वर्ष तक

(3) कृषि :- उत्तर वैदिक कालीन आर्यों का कृषि कर्म मुख्य उद्यम था ।

(4) धार्मिक जीवन :- इसी काल में यज्ञ एवं अनुष्ठान की परंपरा थी । अश्वमेध, राजसूय, वाजपेय आदि विशाल यज्ञों का प्रचलन इसी युग में हुआ ।

(5) दार्शनिक चिंतन :- उपनिषद् साहित्य में मिलने वाली तत्व मीमांसा आर्यों की सर्वोच्च उपलब्धि है । इनमें एकत्ववाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है ।

परिवार को ‘कुल’ व परिवार के मुखिया को ‘कुलप‘ कहा जाता था । संयुक्त परिवार प्रथा का प्रचलन था । अनेक परिवारों को मिलाकर ‘ग्राम’ का निर्माण होता था । ग्राम के प्रधान को ‘ग्रामणी’ कहा जाता था । अनेक ग्रामों को मिलाकर एक ‘विश’ का निर्माण होता था । ‘विश’ के सर्वोच्च अधिकारी को ‘विशपति’ कहा जाता था । अनेक विशों को मिलाकर ‘जन’ का निर्माण होता था । ‘जन’ के सर्वोच्च अधिकारी को ‘रक्षक’ ,’गोपति’ या “राजन” कहा जाता था ।

राजा जिन मंत्रियों की सहायता से कार्य करता था ,उन्हें ‘रत्निन’ कहा जाता था ।

संस्कार :-

संस्करों का शास्त्रीय विवेचन सर्वप्रथम ‘वृहदारण्यकोपनिषद्’ से प्राप्त होता है । इनकी संख्या 16 है जो निम्न है –

(1) गर्भाधान संस्कार :- एक पुरुष जिस क्रिया के द्वारा स्त्री में अपना वीर्य स्थापित करता है ऐसे गर्भाधान संस्कार का जाता है । स्त्री के ऋतुकाल की चौथी रात्रि से लेकर सोलहवीं रात्रि तक का समय गर्भाधान संस्कार के लिए उपयुक्त माना जाता था ।

(2) पुंसवन संस्कार :- स्त्री द्वारा गर्भ धारण करने के तीसरे ,चौथे अथवा आठवें माह में पुत्र प्राप्ति की इच्छा हेतु यह संस्कार किया जाता था ।

(3) सीमंतोन्नयना संस्कार :- यह संस्कार गर्भवती स्त्री के गर्भ की रक्षा के लिए करके गर्भ के चौथे अथवा पाँचवें महा में किया जाता था ।

(4) जातकर्म संस्कार :- शिशु के जन्म के उपरांत यह संस्कार किया जाता था । इस संस्कार के समय पिता नवजात शिशु को अपनी अंगुली से मधु अथवा घृत चटाता था तथा उसके कान में मेघाजनन का मंत्र पढ़ता था तथा उसे आशीर्वाद देता था ।

(5) नामकरण संस्कार :- यह संस्कार नवजात शिशु के नाम रखने हेतु किया जाता था ।

(6) निष्क्रमण संस्कार :- नवजात शिशु को घर से बाहर निकाले जाने के अवसर पर किया जाने वाला संस्कार ।

(7) अन्नप्राशन संस्कार :- यह संस्कार शिशु के जन्म के 6वें मास में किया जाता है । इसमें शिशु को ठोस अन्न खिलाया जाता है ।

(8) चूड़ाकर्म संस्कार :- इस संस्कार को मुंडन अथवा चौल संस्कार के नाम से भी जाना जाता है । इस संस्कार के द्वारा शिशु के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है । इस संस्कार के अवसर पर शिशु के सिर के संपूर्ण बाल मुंडवा दिए जाते हैं ।

(9) कर्णवेध संस्कार :- यह संस्कार रोग आदि से बचने और आभूषण धारण करने के उद्देश्य से किया जाता है ।

(10) विद्यारंभ संस्कार :- यह संस्कार बालक के जन्म के 5 वर्ष में संपन्न किया जाता है । इस संस्कार के अंतर्गत बालक को अक्षरों का ज्ञान कराया जाता है ।

(11) उपनयन संस्कार :- बालक के शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाने पर यह संस्कार किया जाता है । इस संस्कार के अवसर पर बालक को यज्ञोपवित धारण करवा के ब्रह्मचार्य आश्रम में प्रविष्ट कराया जाता था ।

(12) वेदारम्भ संस्कार :- इस संस्कार का उल्लेख सर्वप्रथम व्यास स्मृति में मिलता है । इसके अनुसार गुरु विद्यार्थी को वेदों की शिक्षा देना प्रारम्भ करता था ।

(13) केश अथवा गोदान संस्कार :- यह बालक के 16 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर किया जाने वाला संस्कार है । इस अवसर पर बालक की प्रथम बार दाढ़ी मूछों को मुंडा जाता था ।

(14) समावर्तन संस्कार :- जब बालक विद्या अध्ययन पूर्ण करें गुरुकुल से अपने घर को वापस लौटता था ,तभी इस संस्कार का संपादन किया जाता था । इसमें बालक अपने गुरु को उचित गुरु दक्षिणा देता था ।

(15) विवाह संस्कार :- इस संस्कार के साथ ही मनुष्य गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होता था ।

(16) अन्त्येष्टि संस्कार :- यह मनुष्य के जीवन का अंतिम संस्कार है जो व्यक्ति के निधन हो जाने के पश्चात संपन्न किया जाता है ।

विवाह :-

विवाह संस्कार का पूर्ण विवरण हमें गृहसूत्रों से प्राप्त होता है । विवाह निम्न प्रकार के होते थे –

(1) ब्रह्म विवाह :- यह सर्वोत्तम प्रकार का विवाह है । इसमें पिता उत्तम सजातीय योग्य वर को आमंत्रित कर वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत कर अपनी कन्या को धार्मिक विधि से वर को देता था ।

(2)दैव विवाह :- इस प्रकार के विवाह में कन्या पक्ष द्वारा कन्या को वस्त्राभूषण से अलंकृत कर यज्ञ करने वाले पुरोहित को दान में दिया जाता था ।

(3) आर्ष विवाह :- इसमें कन्या का पिता वर से एक अथवा दो गाय धार्मिक कृत्यों हेतु लेकर अपनी कन्यादान कर देता था ।

(4) प्रजापत्य विवाह :- इस प्रकार के विवाह में वर पक्ष कन्या के पिता से कन्या को माँगता था ।

(5) आसूरी विवाह :- इस विवाह में पुरुष कन्या के माता-पिता को यथाशक्ति धन देकर कन्या को प्राप्त करता था ।

(6) गंधर्व विवाह :- जिसमें स्त्री व पुरुष परस्पर निश्चय कर एक दूसरे के साथ गमन करते हैं ,वह गंधर्व विवाह कहलाता है ।

(7) पैशाच विवाह :- सोई हुई अथवा पागल कन्या के साथ मैथुन करना पैशाच विवाह कहलाता है ।

(8) राक्षस विवाह :- रोती- बिलखती कन्या का बलपूर्वक अपहरण कर उससे किया गया विवाह राक्षस विवाह कहलाता है ।

दशराज्ञ युद्ध :-ऋग्वैदिककालीन यह युद्ध भारतवंशी नरेश सुदास एवं दस राज्यों के संघ के मध्य परूष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ ।

नदियों के प्राचीन नाम :-

प्राचीन नाम वर्तमान नामप्राचीन नाम वर्तमान नाम
सिंधुइण्डसगोमतीगोमल
कुंभाकाबुलक्रुमुकुर्रम
स्वस्तुस्वातदृषद्वतीघग्घर
सरस्वतीसरसूतीवितस्ताझेलम
आशिक्नीचिनाबविपाशाव्यास
शतुद्रिसतलजपरूष्णीरावी

वैदिक युग की विशेषताएं :-

(1) लोहे युगीन सभ्यता
(2) ग्रामीण संस्कृति
(3) पितृसत्तात्मक समाज
(4) पवित्र पशु गाय
(5) प्रिय पशु अश्व
(6) सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी सिंधु
(7) सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती
(8) सोमरस प्रिय पेय पदार्थ
(9) पशुपालन एवं कृषि अर्थव्यवस्था
(10) मृदभांड ‘चित्रित धूसर’
(11) आर्यों की भाषा संस्कृत

Vaidik Sabhyata Notes in Hindi

इन्हें भी देखें – प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स

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