राजस्थान में जनपद काल

Rajasthan ke Pramukh Janpad

 छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में उत्तर भारत में अनेक विस्तृत और शक्तिशाली स्वतंत्र राज्यों की स्थापना हुई , जिन्हें महाजनपदों की संज्ञा दी गई । बौद्ध ग्रंथ ‘अगुत्तरनिकाय’ के अनुसार उस समय 16 महाजनपद विद्यमान थे –

Rajasthan ke Pramukh Janpad
Rajasthan ke Pramukh Janpad

राजस्थान के प्रमुख जनपद

वैदिक सभ्यता के विकास क्रम में राजस्थान में जनपदों का उदय देखने को मिलता है । यूनानी आक्रमण के कारण पंजाब की मालव, शिवि, अर्जुनायन आदि जातियां, जो अपने साहस और शौर्य के लिए प्रसिद्ध थी, राजस्थान में आई और यहीं पर निवास करने लगी । इस प्रकार राजस्थान के पूर्वी भाग में जनपदीय शासन व्यवस्था का सूत्रपात हुआ । राजस्थान के प्रमुख जनपद ये थे – जांगल ( बीकानेर व जोधपुर ), मत्स्य ( अलवर व भरतपुर) , शूरसेन जनपद, शिवि जनपद , कुरू जनपद , मारवाड़ , गुर्जरत्रा, अर्बुदेश,माड, हाड़ौती,सपादलक्ष,ढूंढाड़ आदि ।

मत्स्य जनपद

अलवर, करौली, जयपुर तथा भरतपुर का कुछ भाग मत्स्य देश का क्षेत्र था । इसकी राजधानी विराटनगर (आधुनिक बैराठ) थी । महाभारत काल में यह राज्य राजनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है ।

महाभारत में कहा गया है कि शहाज नामक एक राजा ने चेदि तथा मत्स्य दोनों राज्यों पर शासन किया । मत्स्य प्रारंभ में चेदि राज्य का और कालांतर में यह विशाल मगध साम्राज्य का अंग बन गया ।

शूरसेन जनपद

इसका क्षेत्र अलवर, धौलपुर, भरतपुर तथा करौली था। इसकी राजधानी मथुरा थी । प्राचीन यूनानी लेखक इस राज्य को “शूरसेनोई” तथा राजधानी को “मेथोरा” कहते हैं ।

महाभारत के अनुसार यहां यदु (यादव) वंश का शासन था । वासुदेव के पुत्र श्री कृष्ण का संबंध इसी जनपद से था ।

जांगल देश

वर्तमान बीकानेर व जोधपुर के जिले महाभारत काल में ‘जांगल देश’ कहलाते थे । कहीं-कहीं इसका नाम कुरू-जांगला और माद्रेय- जांगला भी मिलता है । इस जनपद की राजधानी अहिछत्रपुर थी, जिसे इस समय नागौर कहते हैं ।

बीकानेर के राजा इसी जांगल देश के स्वामी होने के कारण स्वयं को ‘जांगलधर बादशाह’ कहते थे । बीकानेर राज्य के राजचिह्न में भी ‘जय जांगलधर बादशाह’ लिखा मिलता है ।

शिवि जनपद

शिवि जनपद की राजधानी शिवपुर थी तथा राजा सुशिन ने उसे अन्य जातियों के साथ 10 राजाओं के युद्ध में पराजित किया था । प्राचीन शिवपुर की पहचान वर्तमान पाकिस्तान के शोरकोट नामक स्थान से की जाती है । कालांतर में दक्षिणी पंजाब की यह शिवि जाति राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में निवास करने लगी ।

चित्तौड़गढ़ के पास स्थित नगरी इस जनपद की राजधानी थी । मेवाड़ के अनेक स्थानों से शिवियों के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं । मंदसौर के पास 5 गुहालेख प्राप्त हुए हैं जिनसे शिवि जनपद का प्रसार पश्चिम से लेकर दक्षिण पूर्व तक होना ज्ञात होता है ।

अर्जुनायन जनपद

शुंग-कण्व काल में अलवर, भरतपुर, आगरा एवं मथुरा का भूभाग ‘अर्जुनायन’ राज्य कहलाता था । इस क्षेत्र में ‘अर्जुनायना जय: ‘ अंकित सिक्के प्राप्त हुए हैं ।

मेदपाट (मेवाड़)

परवर्ती काल में उदयपुर- चित्तौड़ के शासकों को म्लेच्छों से निरंतर संघर्ष करना पड़ा , इसलिए म्लेच्छों को मारने वाला अर्थात् ‘मेद’ कहा जाने लगा तथा उनके क्षेत्र को ‘मेदपाट’ जिसे मेवाड़ कहा जाता है ।

उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा व डूंगरपुर जिले इसके अंतर्गत आते हैं ।

मालव जनपद

सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया तो मालव पंजाब से भागकर नगर ( टोंक) आ गए । मालवों ने इस क्षेत्र में मालवनगर बसाया जो अब कर्कोटनगर के नाम से जाना जाता है । कर्कोटनगर को मालवों ने अपनी राजधानी बनाया ।

कर्कोटनगर से ‘मालवानाम जय: ‘ अथवा ‘जय-मालवानाम्’ उदघोष लिखे हुए कुछ सिक्के प्राप्त हुए हैं ।

यौधेय जनपद

राजस्थान के उत्तरी भाग (गंगानगर, हनुमानगढ़ व बीकानेर का कुछ भाग ) में ‘यौधेय’ एक बलशाली व गणतंत्रीय कबीले का विस्तार था । उन्होंने अपनी मुद्रा चलाई जिस पर “यौधेय गणस्य जय: ” लिखा हुआ था । यौधेय गुप्त साम्राज्य के अधीन हो गए ।

शाल्व जनपद

अलवर में मत्स्य जनपद के निकट शाल्व जनपद था । महाभारत के अनुसार शाल्वों की राजधानी ‘मृत्तिकावती’ थी ।

अवंती जनपद

महात्मा बुद्ध के काल में उदयपुर व चित्तौड़गढ़ जिला और उसके आसपास का विशाल भूभाग भारत के सोलह महाजनपदों में से अवंती महाजनपद में शामिल था । अवंती राज्य के प्रद्योत शासकों के पतन के बाद यह क्षेत्र मगध साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया ।

चेदी जनपद

🔸शाल्वों के साथ चेदि जनपद भी मत्स्य के निकट स्थित था ।

राजन्य जनपद

🔸यह जनपद भरतपुर के पास स्थित होने के प्रमाण मिलते हैं ।

मारवाड़

🔸इसे प्रारंभ में मरू और फिर मरुवार और अंत में मारवाड़ कहा जाने लगा । यह क्षेत्र जोधपुर के आसपास फैला हुआ था ।

गुर्जरत्रा

🔸जोधपुर के दक्षिणी भाग को गुर्जरत्रा कहते थे ।

अर्बुदेश

🔸सिरोही के आसपास के क्षेत्र की गणना अर्बुद देश में की जाती थी ।

माड

🔸जैसलमेर राज्य को पूर्वकाल में माड कहा जाता था।

सपादलक्ष

🔸जांगल देश के पूर्वी भाग को सपादलक्ष कहते थे । सपादलक्ष क्षेत्र पर चौहन शासकों का राज्य स्थापित हुआ और यह ‘सपादलक्ष नृपति’ कहलाने लगे । जब इनका राज्य विस्तार हुआ तथा राजधानी शाकंभरी (सांभर) हुई तब ये ‘शाकंभरीश्वर’ कहलाने लगे ।

हाड़ौती

🔸कोटा एवं बूँदी जिलों का क्षेत्र हाड़ौती कहलाता है ।

ढूंढाड़

🔸जयपुर के आसपास का क्षेत्र ढूंढाड़ कहलाता है ।

जनपदीय सिक्के –

राजस्थान के नलियासर (सांभर- जयपुर ), नगर (टोंक ), रैढ़ ( टोंक), चाकसू (जयपुर ), कुन्दरा ( सवाई माधोपुर ) , मालपुरा (टोंक ), धनाराम की ढाणी (सूरतगढ़, गंगानगर ) , नगरी (चित्तौड़ ), सांभर (जयपुर ) एवं नमाना ( बूँदी) में जनपदीय सिक्के मिले हैं ।

राजस्थान में यौधेय, मालव , अर्जुनायन व शिवि जनपदों ने अपने -2 क्षेत्रों में तांबे के सिक्के प्रचलित किए जिन पर ब्राह्यी लिपि में ‘जय यौधेयानां’ , ‘ जय मालवानां’, ‘मझमिकाय शिवि जनपदस’ अंकित रहता था ।

जनपदीय सिक्कों पर वृषभ, हिरण, हाथी के चिन्ह मिलते हैं । इन पशुओं के साथ-साथ यूप स्तम्भ स्थल, वृक्षादि चिन्ह भी इन सिक्कों पर बने रहते थे ।

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