जैत्रसिंह का इतिहास (1213-1253 ई.)

राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति में आज हम गुहिल वंश के क्षेमसिंह,सांमत सिंह ,कुमार सिंह व जैत्रसिंह का इतिहास की बात करेंगे ।

 

जैत्रसिंह का इतिहास
जैत्रसिंह का इतिहास

रावल क्षेमसिंह

  • रणसिंह के शासनकाल में गुहिल वंश दो शाखाओं में बट गया – (१) रावल शाखा (२) राणा शाखा
  • रणसिंह के पुत्र क्षेमसिंह ने मेवाड़ की रावल शाखा को जन्म दिया, जो मेवाड़ के शासक बने ।
  • क्षेमसिंह , रणसिंह का उत्तराधिकारी बनकर मेवाड़ का शासक बना ।
  • रावल क्षेमसिंह के 2 पुत्र सामंत सिंहकुमार सिंह हुए ।

सामंत सिंह का इतिहास (1172-1177 ई.)

  • सामंत सिंह 1172 ईस्वी में मेवाड़ का शासक बना । उसने 1174 ईस्वी के लगभग गुजरात के शासक संभवत: अजयपाल को युद्ध में परास्त कर उससे मेवाड़ के कई भागों को छीन कर अपने अधिकार में कर लिया ।
  • मेवाड़ के पड़ौसी और नाडोल (जोधपुर राज्य के गोडवाड़ जिले में ) के चौहान राजा कीतू (कीर्तिपाल ) ने 1177 ईसवी के लगभग सामंत सिंह को पराजित कर उसे मेवाड़ का राज्य छीन लिया ।
  • सामंतसिंह ने मेवाड़ राज्य छूट जाने पर वागड़ के शासक चौरसीमलक (चोरसीमल) को पराजित कर वहां की राजधानी बड़ौदा (वद्रपटक) पर अधिकार कर लिया ।
  • सन् 1178 ईस्वी के आसपास वागड़ क्षेत्र में गुहिल वंश के शासन की नींव डाली । सामंतसिंह के वंशज अब वागड़ क्षेत्र के ही स्वामी बने रहे ।
  • सामंतसिंह के संबंध में जानकारी 6 अभिलेखों से प्राप्त होती है , जिनमें दो अभिलेख जगमाता मंदिर में (1172 ईस्वी ) , एक अभिलेख घांटा माता मंदिर में (1178 ईस्वी का ) एवं एक अभिलेख बोरेश्वर महादेव मंदिर ( सलेज,डूँगरपुर 1179 ई.) शामिल है ।

कुमार सिंह का इतिहास (1179 ई.)

  • कीर्तिपाल को क्षेमसिंह के छोटे पुत्र कुमार सिंह ने 1179 ई. के लगभग पराजित कर मेवाड़ पर पून: अधिकार किया । इस प्रकार मेवाड़ पर गुहिल वंश के शासन की पुनः स्थापना हुई ।
  • महाराणा कुंभा के समय के कुंभलगढ़ के अभिलेख में कुमार सिंह के बारे में उल्लेख है कि इसने अपने पैतृक राज्य जीने वाले कीर्तिपाल नामक राजा को देश से निकाला एवं गुजरात के राजा को प्रसन्न कर आहड़ पर अधिकार किया तथा स्वयं मेवाड़ का शासक बना ।
  • गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव द्वित्तीय ने आहड़ पर अधिकार कर लिया तथा कुमार सिंह ने चित्तौड़ पर । उसने चित्तौड़ से मेवाड़ का शासन चलाया ।

जैत्रसिंह का इतिहास (1213-1253 ई.)

  • कुमारसिंह का वंशज महारावल जैत्रसिंह प्रतापी व पराक्रमी राजा हुआ ।
  • चीरवा के लेख के अनुसार मेवाड़ के उत्तरवर्ती शासकों में जैत्रसिंह शक्तिशाली शासक हुआ ।
  • जैत्रसिंह ने नाडौल के समकालीन चौहान वंश के शासक उदयसिंह के विरुद्ध अभियान छेड़ा । उदयसिंह ने नाडोल को बचाने के लिए अपनी पौत्री रूपादेवी का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह से करके वैर को समाप्त किया ।
  • जैत्रसिंह के समय दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने नागदा पर आक्रमण किया व नागदा को भारी क्षति पहुंचाई । तब जैत्रसिंह ने मेवाड़ की राजधानी अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित स्थान चित्तौड़ को बनाया ।
  • जयसिंह सूरी के ग्रंथ ‘हमीर मद मर्दन’ में जैत्रसिंह द्वारा इल्तुतमिश को हराकर पीछे धकेलने का उल्लेख है ।
  • रावल समरसिंह के आबू अभिलेख में भी इसका वर्णन है । इसके अनुसार जैत्रसिंह ने 1221 ई. के लगभग गुजरात के चालुक्य शासक लावण्यप्रसादवीरधवल से आटपुर (आहड़) अधिकार वापस छीन लिया था ।
  • राणा कुंभा की कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में जैत्रसिंह चित्रकूट, मेदपाट, आहड़ एवं वागड़ का राजा बताया गया है ।
  • डॉ. दशरथ शर्मा जैत्रसिंह के काल को मध्यकालीन मेवाड़ के इतिहास का स्वर्ण काल मानते हैं ।
  • ‘श्रावक प्रतिक्रमणसूत्रचूर्णि’ नामक ग्रंथ के आधार पर जैत्रसिंह का देहांत 1253 ईस्वी के आसपास होना अनुमानित है ।
  • इसकी रानी जयतल्लदेवी ने चित्तौड़ में श्यामा पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया ।
  • जैत्रसिंह का उत्तराधिकारी तेजसिंह हुआ ।

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