सूफी आंदोलन तथा उसके प्रमुख सुफी संत

Sufi Andolan Notes in Hindi

 

Sufi Andolan Notes in Hindi
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Sufi Movement Notes in Hindi

 सूफी शब्द अरबी के शब्द सफा से निकला है । इसके दो अर्थ हैं – एक अर्थ में यह ऊन के कपड़े पहनने वालों के प्रयुक्त होता है, तो दूसरे अर्थ में यह शुद्धता एवं पवित्रता का प्रतीक है ।

सूफी शब्द का प्रयोग करने वाला प्रथम लेखक बसरा के जाहिज (869 ई.) थे । भारत में आने वाले प्रथम सूफी संत अल-हुज्जवीरी या दातागंज बख्श थे । इन्होंने कश्फ-उल-महजूब की रचना की । इसे सूफी मत का प्रमाणिक तथा मान्य ग्रंथ माना जाता है ।

सूफी संप्रदाय विभिन्न सिलसिलों में विभाजित था । बारहवीं शताब्दी तक सूफी संप्रदाय 12 सिलसिलों में विभाजित था । सोलवीं सदी में अबुल फजल ने लिखा है कि भारत में सूफी संप्रदाय के 14 सिलसिले थे ।

सूफी परंपरा के अनुसार गुरु (पीर), शिष्य (मुरीद) तथा उत्तराधिकारी (वली) होते थे और सूफी संत के निवास को खानकाह या मठ कहा जाता था ।

सूफी सिलसिले दो प्रकार के होते थे , जो इस्लामी सिद्धांत के समर्थक थे उन्हें बा-शारा तथा जो इस्लामिक सिद्धांत से बँधे नहीं थे उन्हें बे-शारा कहते थे । बा-शारा के दो महत्वपूर्ण संप्रदाय थे – चिश्ती एवं सुहरावर्दी ।

प्रमुख सूफी संत –

 (1) हजरत मोईनुद्दीन चिश्ती
(2) बाबा फरीद
(3) शेख नुरूद्दीन
(4) हजरत निजामुद्दीन औलिया
(5) बहाउद्दीन जकारिया
(6) अमीर खुसरो
(7) गेसूदराज

(1) चिश्ती सिलसिला (संप्रदाय )

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 1192 ईसवी के पूर्व में भारत आए थे और बाद में उन्होंने ही भारत में सूफी मत में चिश्ती सिलसिला की शुरुआत थी । भारत में कई स्थान पर घूमने के बाद 1206 ईस्वी में अजमेर में स्थाई रूप से बस गए । अजमेर में संत मोइनुद्दीन चिश्ती की प्रसिद्ध दरगाह “अजमेर शरीफ” के नाम से जानी जाती है । इनके मुरीद या चाहने वाले उन्हें ‘ख्वाजा साहब’ या ‘गरीब नवाज’ के नाम से भी याद करते हैं ।

इनके शिष्यों में ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी एवं हमीउद्दीन नागौरी प्रमुख थे । इनके शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी ने नागौर के पास सुवल गांव में अपना केंद्र बनाकर इस्लाम का प्रचार किया । चिश्ती सिलसिला संगीत को ईश्वर प्रेम का महत्वपूर्ण साधन मानता है ।

ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी का जन्म 1186 में फरगना में हुआ था तथा वे इल्तुतमिश के समय भारत आए थे । कुतुबुद्दीन ऐबक ने इनकी ही याद में क़ुतुबमीनार बनाया था । इनकी मृत्यु 1235 ई. में शेख अली सिस्तानी के मठ में हुई थी ।

बाबा फरीद

दिल्ली में बख्तियार काकी के उत्तराधिकारी शेख फरीदुद्दीन गंज शकर थे । ये बाबा फरीद के नाम से लोकप्रिय थे । इन्होंने हांसी तथा अजोधन को अपना केंद्र बनाया । इनका जन्म मुल्तान में हुआ था । पंजाब में इनका उपदेश काफी लोकप्रिय हुआ तथा गुरु ग्रंथ साहिब में इनके उपदेशों को स्थान दिया गया । इनकी मृत्यु 1265 ईस्वी में हुई थी । उन्हें पाकपाटन (पंजाब) में दफनाया गया ।

बाबा फरीद के शिष्य में शेख अलाउद्दीन साबिर एवं शेख निजामुद्दीन औलिया के नाम प्रमुख है , जिनसे क्रमश: साबिरी एवं निजामी दो उपशाखाओं का विकास हुआ ।

शेख निजामुद्दीन औलिया

दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया का नाम विशेष उल्लेखनीय है । इनका जन्म बदायूं में 1236 ईस्वी में हुआ । निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली के सात सुल्तानों का कार्यकाल देखा था । ये योग में इतने दक्ष थे कि योगी इन्हें सिद्ध मानते थे ।

निजामुद्दीन औलिया की दरगाह ग्यासपुर (दिल्ली) में है । गयासुद्दीन तुगलक को निजामुद्दीन औलिया ने कहा था “अभी दिल्ली दूर है ।”

इन्हें महबूब- ए- इलाही तथा सुल्तान-उल- औलिया की उपाधि मिली थी । बंगाल में निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य शेख सिराजुद्दीन उस्मानी थे जिनको आखि सिराज कहा जाता है । शेख निजामुद्दीन औलिया ने इसे आइना-ए-हिंद की उपाधि दी थी । इनके प्रमुख शिष्य थे – शेख सलीम चिश्ती , अमीर खुसरो , अमीर हसन देहलवी ।

शेख नसीरुद्दीन महमूद शेख

ये निजामुद्दीन औलिया के उत्तराधिकारी थे । ये अपनी पदवी चिराग दिल्ली के नाम से लोकप्रिय हैं । शेख चिराग दिल्ली के प्रमुख शिष्यों में ख्वाजा सैयद मोहम्मद गेसूदराज का नाम प्रमुख है – उनके प्रमुख ग्रंथों में खतायरूल, कुद्स, अस्म-उल-असरार, शरह-ए-रिसाले कुशेरी, शरह-ए-मशारिका, मारिफ, शरह-ए- आदाबुल मुरीदीन प्रमुख है ।

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो का मूल नाम मुहम्मद हसन था । इनका जन्म पटियाली (पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदायूं के पास) 1253 ईसवी में हुआ था । खुसरो प्रसिद्ध सूफी संत शेख निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । वह बलबन से लेकर मोहम्मद तुगलक तक दिल्ली सुल्तानों के दरबार में रहे । इन्हें तूतिए हिंद (भारत का तोता) के नाम से भी जाना जाता है। सितार एवं तबले के आविष्कार का श्रेय अमीर खुसरो को ही दिया जाता है ।

शेख सलीम चिश्ती

चिश्ती शाखा के महत्वपूर्ण संत शेख सलीम चिश्ती थे । उनको शेख-उल-हिंद की संज्ञा से विभूषित किया गया था । उन्होंने सीकरी में अपना मठ (खानकाह) बनाया । यहीं पर अकबर ने फतेहपुर सीकरी की स्थापना की थी तथा अपने पुत्र का नाम सलीम (जहांगीर) रखा था ।

शेख कद्दुस गंगोही भी प्रमुख चिश्ती संत थे । इन्होंने अपनी खानकाह गंगोह (सहारनपुर ) में स्थापित की थी । ये अलख उपनाम से कविताएं भी लिखते थे ।

दक्षिण में भी चिश्ती संप्रदाय का विकास हुआ । इसकी नींव शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने रखी जो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । उन्होंने दौलताबाद को अपना स्थायी निवास बनाया ।

हाजीरूमी नामक चिश्ती संत ने बीजापुर में अपना खानकाह स्थापित किया । सैयद मुर्तजा ने योग कलंदर नामक पुस्तक लिखी थी ।

शेख हुशैनी गेसूदराज

इनको बंदा नवाज की उपाधि मिली थी । इनको बहमनी सुल्तान फिरोज शाह बहमनी ने बतौर भूमि अनुदान 4 गांव प्रदान किये । इन्होंने प्रचलित चिश्ती मत के विपरीत कुछ हद तक इस्लामी कानून को प्रमुखता दी ।

(2) सुहरावर्दी सिलसिला

बहाउद्दीन जकारिया

सूफीयों के सुहरावर्दी धर्मसंघ या सिलसिला की स्थापना शेख शिहाबुद्दीन उमर सुहारवर्दी ने की, किंतु 1262 ई. में इसके सुदृढ़ संचालन का श्रेय शेख बहाउद्दीन जकारिया को है । उन्होंने सिंध एवं मुल्तान को मुख्य केंद्र बनाया । इल्तुतमिश ने इन्हें शेख-उल- इस्लाम (इस्लाम के प्रमुख) की उपाधि से सम्मानित किया ।

शेख बहाउद्दीन जकारिया के शिष्यों में शेख हुसैन अमीर हुसैनी सुहारवर्दी प्रमुख थे । इन्होंने – नुजहतुय अखह, कन्जुम रम्ज, तराब-उल-मजलिस, सरित-उल-मुस्तकीम, जद-उल-मुसाफरीज आदि प्रमुख ग्रंथ लिखे ।

सुहारवर्दी धर्मसंघ के अन्य प्रमुख संत थे – जलालुद्दीन तबरीजी, सैय्यद सुर्ख जोश, बुरहान आदि ।

सुहारवर्दी की दो प्रमुख शाखा थी – फिरदौसी तथा सत्तारी

(१) फिरदौसी शाखा – इस सिलसिले के संस्थापक समरकंद के शेख बदरुद्दीन थे । इस शाखा का कार्य क्षेत्र बिहार था । इस सिलसिले को शेख शरीफउद्दीन याह्या ने लोकप्रिय बनाया ।

(२) सत्तारी शाखा – इस सिलसिले के संस्थापक शाह अब्दुल्ला सत्तारी थे । यह शाखा मध्य एशिया तथा ईरान में इश्किया तथा तुर्की में बुस्तामिया के नाम से प्रसिद्ध थी । शेख बुद्धन सत्तारी जौनपुर में इस मत के प्रमुख संत थे ।

ग्वालियर के शाह मुहम्मद गौस इस शाखा के अन्य प्रमुख संत थे । इन्होंने बहरूल हयात का पुन: अनुवाद किया । मुहम्मद गौस को तानसेन का गुरु माना जाता है । तानसेन ने इन्हीं से ईरानी संगीत की शिक्षा पाई थी । उन्होंने अमृतकुंड नामक संस्कृत ग्रंथ का फारसी में अनुवाद किया ।

उन्होंने बहर-उल-हयात का सिद्धांत दिया जो आगे चलकर दारा शिकोह द्वारा प्रतिपादित मज्म-उल बहरीन का आधार बना ।

प्रमुख सूफी सिलसिले

सिलसिला संस्थापक प्रभाव क्षेत्र
चिश्ती  ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीभारतीय उपमहाद्वीप
सुहारवर्दी हजरत बहाउद्दीन जकारिया सिंध एवं मुल्तान
कादिरी शेख अब्दुल कादिर जिलानी मुल्तान, पंजाब
शत्तारी शाह अब्दुल्लाह शत्तारी मध्य और पूर्वी भारत
नक्शबंदी  ख्वाजा बाकी बिल्लाहपंजाब एवं दिल्ली
फिरदौसी शेख बदरुद्दीन बिहार
कुब्रवियामीर सैयद अली हमदानी  कश्मीर
कलंदरी शेख अबूबकर लूसी दिल्ली, पंजाब

महत्वपूर्ण बिंदु –

🔸वहादत-उल-वजूद अथवा ईश्वर की एकता के सिद्धांत का प्रतिपादन इब्नुल अरबी ने किया ।

🔸चिश्ती पंथ के लोग संगीत, योग और अद्वैतवाद के सिद्धांत में विश्वास करते थे ।

🔸दारा शिकोह कादिरी सिलसिला से संबंधित था ।

🔸औरंगजेब नक्शबंदी सिलसिला से संबंधित था ।

🔸अहमद फारुख सरहिंदी ख्वाजा बाकी बिल्लाह के शिष्य थे ।

🔸सूफियों में सर्वाधिक कट्टरवादी सिलसिला नक्शबंदी सिलसिला था ।

🔸अकबर द्वारा प्रतिपादित दीन ए इलाही धर्म का खंडन शेख अहमद सरहिंदी ने किया ।

🔸हुमायूं के समकालीन मुहम्मद गौस शेख अब्दुल सत्तार थे ।

🔸कलंदरिया सिलसिला के प्रवर्तक सूफी संत अब्दुल अजीज मक्की थे ।

🔸मदारिया सिलसिला के प्रवर्तक शेख बहीउद्दीन शाहमदार थे ।

🔸महदवी सिलसिला के संस्थापक जौनपुर के मुहम्मद थे ।

🔸रौशनियां संप्रदाय के संस्थापक मियां बयाजिद अंसारी थे ।

🔸इलाही मुहम्मदी सिद्धांत का प्रतिपादन ख्वाजा मीर दर्द ने किया ।

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