राजस्थान की मिट्टियां तथा उसके प्रकार

राजस्थान की मिट्टियाँ (Rajasthan ki mitiya)

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है । राजस्थान भी भारत का एक विशाल राज्य है ,जिसकी 75% जनसंख्या मिश्रित कृषि पर निर्भर है । कृषि के उपयोग के लिए मिट्टी की गुणवत्ता अति आवश्यक है ।

राजस्थान की अधिकांश मिट्टी रेतीली बलुई मिट्टी है। राजस्थान में मिट्टी की उर्वरता पश्चिम और उत्तर- पश्चिम से पूर्व व उत्तर- पूर्व की ओर बढ़ती है ।

rajasthan ki mitiya
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Soil of Rajasthan (राजस्थान की मिट्टीयाँ)

1. रेतीली मिट्टी –

यह मिट्टियाँ चार प्रकार की होती है –
(1) रेतीली बालू मिट्टी
(2)लाल रेतीली मिट्टी
(3) पीली-भूरी रेतीली
(4)खारी मिट्टी

इस मिट्टी का विस्तार राजस्थान में जोधपुर, जयपुर, चूरू, नागौर ,जैसलमेर, पाली आदि जिलों में पाया जाता है ।

मिट्टी के कण अत्यधिक मोटे होने के कारण नमी का अभाव होता है , अतः इस प्रकार की मिट्टी में खरीफ की फसल हो सकती है ।

2. भूरी और रेतीली मिट्टी –

यह मिट्टी मुख्यतया अरावली के पूर्वी भाग में बनास व उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में पाई जाती है ।

इस मिट्टी का रंग भूरा होता है तथा इसमें नाइट्रोजन और फॉस्फोरस लवणों का अभाव पाया जाता है।

यह मिट्टी टोंक ,बूंदी ,सवाई माधोपुर ,भीलवाड़ा, उदयपुर एवं चित्तौड़गढ़ जिले में पाई जाती है ।

3. लाल बलुई मिट्टी-

यह मरुस्थलीय भागों में पाई जाने वाली लाल रंग की मिट्टी है ।

इसमें नाइट्रोजन व कार्बनिक तत्वों की कमी पाई जाती है ।

इसका विस्तार जालौर ,जोधपुर, नागौर, पाली, बाड़मेर ,चुरु ,झुन्झनू जिले में है ।

4. लाल दोमट मिट्टी –

यह बारीक कणों तथा नमी धारण करने वाली लाल मिट्टी है ।

इसमें लौह ऑक्साइड के लवण अधिक होने के कारण इसका रंग लाल होता है ।

इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और कैल्सियन लवणों की कमी पाई जाती है ।

यह मिट्टी दक्षिण राजस्थान के डूँगरपुर ,बाँसवाड़ा, उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जिले में पाई जाती हैं ।

विशेष रूप से मक्के के उत्पादन हेतु उपयुक्त है ।

5. पर्वतीय मिट्टी –

यह मिट्टी अरावली की उपत्यका में पाई जाती है ।

इस मिट्टी का रंग लाल से लेकर पीले भूरे रंग का होता है ।

मिट्टी की गहराई कम होने के कारण इस पर खेती नहीं की जा सकती है ।

इसका विस्तार सिरोही ,उदयपुर ,पाली ,अजमेर और अलवर जिलों के पहाड़ी भागों में है ।

6. जलोढ़ या दोमट मिट्टी –

जलोढ़ मिट्टी नदियों के पानी द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी होती है । इसका रंग पीला होता है ।

यह बहुत उपजाऊ होती है तथा इसमें नमी बहुत समय तक मौजूद रहती है ।

इसमें नाइट्रोजन व कार्बनिक लवण पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं ।

इसमें खरीफ व रबी दोनों प्रकार की फसलें उत्पन्न की जाती है ।

यह मिट्टी अलवर ,जयपुर ,अजमेर, टोंक ,सवाई माधोपुर ,भरतपुर ,धौलपुर ,कोटा आदि जिलों में पाई जाती है ।

यह गेहूं ,चावल ,कपास व तंबाकू की फसल के लिए उपयोगी है ।

इस मिट्टी को कछारी मिट्टी भी कहा जाता है ।

7. काली मिट्टी –

इस मिट्टी में बारीक कण ,नमी धारण की उच्च क्षमता होती हैं ।

काली मिट्टी में फास्फेट, नाइट्रोजन एवं जैविक पदार्थों की अल्पता तथा कैल्शियम एवं पोटाश की पर्याप्तता होती है ।

यह मिट्टी कपास व नकदी फसलों हेतु उपयुक्त होती है ।

इसका विस्तार राज्य के दक्षिणी- पूर्वी भाग कोटा, बूंदी ,बाराँ एवं झालावाड़ में है ।

8. लवणीय मिट्टी –

ऐसी मिट्टी में अधिक सिंचाई करने से लवणों का जमाव हो जाता है ।

इस मिट्टी में क्षारीय व लवणीय तत्वों की अधिकता के कारण अनुपजाऊ होती है ।

यह मिट्टी श्री गंगानगर ,बीकानेर ,बाड़मेर एवं जालौर जिले में पाई जाती है ।

सेम की समस्या जिप्सम डालकर दूर की जाती है ।

9. सीरोजम या धूसर मरुस्थलीय मिट्टी –

इस मिट्टी को अरावली के पश्चिम में रेत के छोटे टीलों वाले भाग में पाए जाने के कारण धूसर मरुस्थली मिट्टी भी कहते हैं ।

इसका रंग पीला भूरा होता है तथा इसमें नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों की कमी होने के कारण उर्वरा शक्ति कमजोर होती है ।

यह मिट्टी पाली ,नागौर, अजमेर व जयपुर जिलों में पाई जाती है ।

राजस्थान की मिट्टियों (rajasthan ki mitiya)  का नई वैज्ञानिक पद्धति से वर्गीकरण (अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर )

विभिन्न जिलों में पाई जाने वाली मिट्टियों की उपस्थिति व उसमें उपस्थित लवणों के आधार पर वैज्ञानिकों ने आधुनिक पद्धति का उपयोग करके मिट्टियों को निम्न वर्गों में बांटा है –

(1) एरिडीसोल ( Aridisols)

एरिडीसोल राजस्थान की शुष्क जलवायु में पाई जाने वाली मृदाएँ हैं । यह मिट्टी राज्य के चूरू, सीकर ,झुंझुनू ,नागौर ,जोधपुर ,पाली और जालौर जिले के कुछ क्षेत्रों में विस्तृत है ।

(2) अस्फीसोल्स (Alfisols)

इन प्रकार की मृदा में अरजिलिक संस्तर उपस्थित होते हैं जिनमें ऊपरी सतहों की तुलना में मटियारी मिट्टी की प्रतिशत मात्रा अधिक होती है ।

इस प्रकार की मिट्टियों से ढका हुआ क्षेत्र राज्य के जयपुर ,अलवर, दौसा, भरतपुर ,सवाई माधोपुर, टोंक ,भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ ,बाँसवाड़ा ,राजसमंद उदयपुर, डूँगरपुर ,बूँदी ,कोटा,बाराँ व झालावाड़ जिले में पाया जाता है ।

(3) एन्टिसोल ( Entisols)

पश्चिमी राजस्थान के लगभग सभी जिलों में इस समूह की मृदाएँ पाई जाती है । इसका रंग प्राय: हल्का पीला-भूरा होता है ।

(4) इनसेप्टिसोल्स ( Inceptisols)

इस प्रकार की मृदा राज्य में सिरोही, पाली, राजसमंद ,उदयपुर ,भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ जिले में विस्तृत है ।

(5) वर्टीसोल्स (Vertisols)

इस मिट्टी में अत्यधिक क्ले(Clay) उपस्थित होते हैं। मटियारी मृदा की सभी विशेषताएं वर्टिसोल्स में पाई जाती हैं ।

यह मृदा राज्य के झालावाड़, बाराँ, कोटा तथा बूंदी जिलों के अधिकतर क्षेत्रों में विस्तृत है ।

मृदा अपरदन (Soil Erosion)

मृदा की ऊपरी सतह पर से उपजाऊ मृदा का स्थानांतरित हो जाना मिट्टी का कटाव या मृदा अपरदन कहलाता है ।

मृदा अपरदन के कारण ( Causes of Soil Erosion)

(1) वनों का ह्रास तथा अंधाधुंध कटाई
(2) कृषि के अवैज्ञानिक तरीके
(3) वर्षा पूर्व मरुस्थलीय अंधड़
(4) ढालू भूमि में जल की तेज धारा से
(5) चरागाहों पर अंधाधुन चराई
(6) पहाड़ी प्रदेशों में आदिवासियों द्वारा ‘वालरा कृषि ‘

समस्या के कुप्रभाव :

  • भीषण तथा आकस्मिक बाढों का प्रकोप
  • निरंतर सुखा
  • भूजल स्तर का गिरना
  • नदी/ नहरों का मार्ग अवरोधित होना
  • कृषि उत्पादन का निरंतर क्षय
  • वायु अपरदन से बोई गई फसल में अंकुरण नहीं होना
मृदा अपरदन को रोकने के उपाय :-
  • जंगलों व चरागाहों की वृद्धि करना
  • चराई पर नियंत्रण रखना
  • खेतों में मेड़बंदी करना
  • ढालू भूमि पर कन्टुर कृषि को बढ़ावा देना
  • पट्टीदार खेती को प्रोत्साहित करना
  • फसलों को हेरफेर कर बोना एवं समय-समय पर खेतों को पड़ती छोड़ना ।
  • नदी के तेज बहाव को रोकने के लिए बांधों का निर्माण करना
  • वृक्षारोपण करना

मरुस्थलीकरण (Desertification)

मरुस्थलीकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके द्वारा किसी भूभाग में रेगिस्तान या मरूभूमि का निर्माण होता है । वनों की अनियंत्रित कटाई व पशुधन की अधिकता से भूमि पर जैविक दबाव पड़ने से मरुस्थलीकरण को बढ़ावा मिलता है ।

जब रेगिस्तान किन्ही कारणों से आगे बढ़ता है ,तो उसे रेगिस्तान की मार्च कहते हैं ।

मरुस्थलीकरण रोकने के उपाय :-

  • सिंचाई के साधनों का विकास किया जाना चाहिए ।
  • मरूभूमि के अनुकूल वृक्षों जैसे खेजड़ी, कीकर, रोहिडा़,जोजोबा ,नीम, बोरड़ी,फोग आदि की खेती को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।
  • सुखी खेती को प्रोत्साहित दिया जाना चाहिए तथा बूंद बूंद सिंचाई व फव्वारा सिंचाई का उपयोग किया जाना चाहिए ।
  • पशुओं की चराई को नियंत्रित किया जाना चाहिए ।
  • उर्जा के वैकल्पिक व पुनर्नवीकरणीय स्रोतों का विकास किया जाना चाहिए ताकि कोयले व जलाने की लकड़ी की बचत कर जंगलों को काटने से रोका जा सके ।

राजस्थान में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएँ:-

(1) सामान्य मिट्टी प्रयोगशाला (जयपुर )
(2) समस्याग्रस्त मिट्टी प्रयोगशाला (जोधपुर )
(3) राज्य में केंद्रीय भू-संरक्षण बोर्ड कार्यालय (कोटा ,जोधपुर )

महत्वपूर्ण तथ्य :-

(1) राजस्थान में मिट्टी का अवनालिका अपरदन सर्वाधिक चंबल नदी से होता है ।

(2) राज्य में बीहड़ भूमि का सर्वाधिक विस्तार धौलपुर, सवाई माधोपुर एवं करौली जिलों में है ।

(3) भूरी दोमट मिट्टी लूनी बेसिन में पाई जाती है ।

(4) जल द्वारा मिट्टी अपरदन मुख्य रूप से दक्षिण एवं पूर्वी जिलों में अधिक होता है ।

(5) पश्चिमी मरुस्थलीय जिलों में मिट्टी अपरदन का मुख्य कारण वायु है ।

(6) मिट्टी में लवणीयता की समस्या कम करने हेतु रॉक फॉस्फेट का प्रयोग किया जाता है ।

(7) मिट्टी की क्षारीयता की समस्या दूर करने के लिए जिप्सम का प्रयोग किया जाता है ।

(8) सर्वाधिक मिट्टी का अपरदन जून -जुलाई महीने में होता है ।

(9) रेगिस्तान में सेवण, अंजन ,मूरठ, मूंज, धामणु, गमोद पौष्टिक घास होती है ।

(10) पहाड़ों की ढलान पर वृक्ष काटकर खेती की जाती है ,उसे वालरा कृषि कहते हैं । राज्य में वालरा कृषि डूँगरपुर जिले में सर्वाधिक होती है ।

(11) काली व लाल दोमट मिट्टी छप्पन के मैदान में पाई जाती है ।

(12) रेगिस्तान को उपजाऊ बनाने के लिए इंदिरा गांधी नहर परियोजना अत्यधिक उपयोगी है ।

(13) चंबल व माही बेसिन में काली मटियार दोमट मिट्टी अधिक है ।

(14) बाढ़ कृत मैदानी मिट्टी उत्तरी-पश्चिमी में घग्घर मैदान में पाई जाती है ।

(15) बाड़मेर व जालौर में लवणीय मिटटी का सर्वाधिक प्रसार है ।

(16) बनास नदी के क्षेत्र में भूरी मिट्टी का प्रसार है ।

(17) भूमि को सुधारने के लिए मरुस्थलीय जिलों में केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्था कजरी(CAZRI) के द्वारा निरन्तर प्रयास जारी है ।

(18) पूर्वी अर्द्धशुष्क मैदान में जलोढ़ मैदानी व भूरी मिट्टी पाई जाती है ।

(19) दक्षिणी- पूर्वी पठारी क्षेत्र में काली ,लाल, पीली व जलोढ़ मिट्टियां पाई जाती है ।

(20) टिब्बेदार पीली-भूरी बलुई मिट्टी पश्चिम में बालुका स्तूप वाले क्षेत्रों में पाई जाती है ।

(21) जिस मिट्टी में चूने की मात्रा अधिक होती है उसे क्षारीय मिट्टी कहा जाता है ।

(22) राजस्व की दृष्टि से सिंचित भूमि को चाही तथा असिंचित भूमि को बारानी कहते हैं ।

(23) गन्ना तथा कपास के लिए सर्वाधिक उपजाऊ काली मिट्टी है ।

(24) लवणीय मृदा में pH का मान 5 से कम होता है ।

(25) पौधों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मृदा pH मान 6-7 होता है ।

(26) सर्वाधिक उत्पादक मृदा का pH परास 6-8 होता है ।

 

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