भक्ति आंदोलन तथा भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

Bhakti Movement Notes in Hindi 

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 Bhakti Aandolan Notes in Hindi

 छठी शताब्दी में भक्ति आंदोलन की शुरुआत तमिल क्षेत्र (दक्षिण भारत ) में हुई, जो कर्नाटक और महाराष्ट्र तक फैल गई ।

भक्ति आंदोलन का विकास 12 अलवार वैष्णव संतो और 63 नयनार शैव संतों ने किया । अलवार संत विष्णु के भक्त थे ।

महत्वपूर्ण नयनार संत अप्पार,नान सबंदर एवं सुंदर मूर्ति थे । तिरूमलिसाई, तिरूमंगई, पेरियल्वार, तिरूपन, कुलशेखर , नम्मालवार एवं मधुरकवि अलवार संत थे । अलवार संतों ने तमिल एवं स्थानीय भाषा में उपदेश दिए ।

शंकराचार्य – इनका जन्म 788 ईस्वी में कलादि (केरल) में हुआ था । अद्वैत वेदांत या अद्वैतवादी दर्शन का प्रतिपादन शंकराचार्य ने किया । हिंदू धर्म का एक्वीनास शंकराचार्य को कहा जाता है । शंकराचार्य को प्रच्छन्न बुद्ध भी कहा जाता है ।

रामानुजाचार्य – इनका जन्म 1017 ईस्वी में मद्रास के निकट पेरूम्बर नामक स्थान पर हुआ था । इन्होंने शंकराचार्य के दर्शन में संशोधन किया तथा उसे भक्ति के अनुकूल बनाया ।

विशिष्टाद्वैत सिद्धांत एवं श्री वैष्णव संप्रदाय की स्थापना रामानुजाचार्य ने की । उन्होंने वेदांत सूत्र पर भाष्य एवं गीता भाष्य नामक टीका लिखी । रामानुज का संप्रदाय श्री संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है ।

निम्बर्काचार्य – इनका जन्म 12 वीं सदी के लगभग तमिलनाडु के निंबापुर नामक स्थान पर हुआ । इनको सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है । इनके अन्य नाम है – नियमानन्द तथा निम्बादित्य ।

इन्होंने द्वैतवाद तथा अद्वैतवाद दोनों को अपने मत में स्थान दिया जिसके कारण इनके दर्शन को द्वैताद्वैत दर्शन कहा जाता है । इनके संप्रदाय को सनक अथवा सनकादि संप्रदाय भी कहा जाता है ।

वेदपरिजात सौरभ की रचना निंबार्काचार्य ने की ।

मध्वाचार्य – इनको आनंदतीर्थ, पूर्णबोध अथवा पूर्णप्रज्ञ के नाम से भी जाना जाता है । इनके दर्शन को द्वैतवाद कहा जाता है । इनका संप्रदाय ब्रह्म अथवा स्वतंत्रास्वतंत्रवाद के नाम से भी जाना जाता है ।

वल्लभाचार्य ( 1479-1530) : इनका जन्म 15वी सदी में वाराणसी के तैलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ तथा इनकी मृत्यु बनारस में हुई । इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम यल्लमगुरू था । इनका विवाह महालक्ष्मी के साथ हुआ । उनके दो पुत्र थे – गोपीनाथ तथा विट्ठलनाथ

इन्होंने गंगा- यमुना संगम के समीप अरैल नामक स्थान पर अपना निवास स्थान बनाया । सूरदास वल्लभाचार्य के शिष्य थे ।

शुद्धाद्वैत वेदांत एवं पुष्टिमार्ग दर्शन का प्रवर्तन वल्लभाचार्य ने किया था । उन्होंने रुद्र संप्रदाय की स्थापना की । वल्लभाचार्य ने अपने मत का प्रचार गुजरात एवं राजस्थान में किया ।

वल्लभाचार्य ने पूर्व मीमांसा भाष्य की रचना की । इसके अतिरिक्त उन्होंने श्रीमद्भागवत की सूक्ष्म टीका,सुबोधिनी टीका की रचना की । इन्होंने वेदांत सूत्र की संस्कृत में टीका लिखी ।

दक्षिण में वैष्णव संतो द्वारा स्थापित चार मत

श्री संप्रदायरामानुजाचार्यविशिष्टाद्वैतवाद
ब्रह्म संप्रदायमाधवाचार्यद्वैतवाद
रुद्र संप्रदायविष्णु स्वामीशुद्ध द्वैतवाद
सनकादि संप्रदायनिम्बार्काचार्य  द्वैताद्वैतवाद

  भक्ति आंदोलन के चरण-

भक्ति आंदोलन के दो चरण थे – (१) 7वीं- 13वीं सदी- दक्षिण भारत (२) 13-16वीं सदी- उत्तर भारत

भक्ति आंदोलन के प्रमुख भक्ति संत –

रामानंद

इनका जन्म 1299 ई. में प्रयाग के कान्यकुब्ज परिवार में हुआ था । इन्होंने रामानुज की भक्ति परंपरा को आगे बढ़ाया तथा उत्तर भारत के विभिन्न नगरों में भ्रमण कर भक्ति आन्दोलन का प्रसार किया ।

स्वामी रामानंद ने जाति प्रथा तथा तत्संबंधित अंधविश्वास एवं आडंबरों को तोड़ डाला । उन्होंने बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों के लिए शिष्यत्व का द्वार खोल दिया । उनके प्रमुख 12 शिष्यों में से अनेक निचली जाति के थे । कबीर (जुलाहा ), रैदास (चमार ), सेना (नाई), धन्ना (जाट ), पीपा (राजपूत),सधना (कसाई) आदि ।

उन्होंने स्त्रियों के लिए भी भक्ति आंदोलन का द्वार खोला तथा पद्मावती एवं सुरसीर नामक महिला को अपनी शिष्या बनाया ।

रामानंद ने राम की भक्ति पर विशेष बल दिया । इन्होंने एक उत्साही विरक्त दल का निर्माण किया जो आज भी वैरागी नाम से विख्यात है ।

स्वामी रामानंद पहले संत थे जिन्होंने हिंदी के माध्यम से अपना संदेश लोगों तक पहुंचाया । भक्ति आंदोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में रामानंद के द्वारा लाया गया ।

रामानंद की शिक्षा से दो संप्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ, सगुण जो पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और निर्गुण जो भगवान की निराकर रूप को पूजता है ।

सगुण संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध व्याख्याताओं में थे- तुलसीदास और नाभादास जैसे राम भक्त और निंबार्क, वल्लभाचार्य, चैतन्य, सूरदास और मीराबाई जैसे कृष्ण भक्त ।

निर्गुण संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध प्रतिनिधि थे कबीर, जिन्हें भावी उत्तर भारतीय पंथों का आध्यात्मिक गुरु माना गया है ।

रामानंद सगुण वैष्णव संप्रदाय से संबंधित थे । इनके आराध्य देव राम और सीता थे । रामानंद ने रामानंदी संप्रदाय की स्थापना की ।

रामानंद द्वारा लिखित एक पद आदि ग्रंथ में भी संकलित है । इनकी मृत्यु 1411 में हुई ।

कबीर

कबीर का जन्म 1440 ईस्वी में वाराणसी में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ । लोक- लज्जा के भय से उसने नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा के पास एक तलाब के समीप छोड़ दिया। जुलाहा नीरू तथा उसकी पत्नी नीमा इस नवजात शिशु को अपने घर ले आए । इस बालक का नाम कबीर रखा गया ।

इन्होंने राम, रहीम, हजरत, अल्लाह आदि को एक ही ईश्वर के अनेक रूप माने । इन्होंने जाति- प्रथा, धार्मिक कर्मकांड, बाह्य आडंबर, मूर्ति पूजा, जप- तप, अवतारवाद आदि का घोर विरोध करते हुए एकेश्वरवाद में आस्था व्यक्त की एवं निराकार ब्रह्म की उपासना को महत्व दिया ।

निर्गुण भक्ति धारा से जुड़े कबीर ऐसे प्रथम भक्त थे, जिन्होंने संत होने के बाद भी पूर्णत: गृहस्थ जीवन का निर्वाह किया । उनके अनुयायी ‘कबीरपंथी’ कहलाए । कबीर के उपदेश सबद सिक्खों के आदि ग्रंथ में संग्रहित हैं ।

कबीर की वाणी का संग्रह “बीजक” (शिष्य धर्मदास द्वारा संकलित) नाम से प्रसिद्ध है । बीजक में 3 भाग है – रमैनी,सबद और साखी । उनकी भाषा को सधुक्कड़ी कहा गया है । इसमें ब्रजभाषा, अवधी एवं राजस्थानी भाषा के शब्द पाए जाते हैं ।

हिंदुओं के अनुसार कबीर रामानंद के शिष्य थे जबकि मुसलमानों के अनुसार शेख तकी के शिष्य थे ।

कबीर के शिष्य धरमदास ने छत्तीसगढ़ में धरमदासी संप्रदाय की स्थापना की । कबीर दास की पत्नी लोई एवं पुत्री कमाली थी ।

कबीर दास की मृत्यु 1510 ई. में मगहर में हुई । यह सुल्तान सिकंदर लोदी के समकालीन थे ।

गुरु नानक

गुरु नानक का जन्म 1469 ईस्वी में तलवण्डी नामक ग्राम में हुआ था, जो अब ननकाना साहिब के नाम से विख्यात है । उनकी माता का नाम तृप्ता देवी तथा पिता का नाम कालूराम था । उनका विवाह बटाला के मूलराज खत्री की बेटी सुलक्षणी के साथ हुआ ।

उन्होंने देश का 5 बार चक्कर लगाया, जिसे उदासीस कहा जाता है । उन्होंने कीर्तनों के माध्यम से उपदेश दिए । अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने रावी नदी के किनारे करतारपुर में अपना डेहरा (मठ) स्थापित किया । अपने जीवन काल में ही उन्होंने अपनी शिष्य भाई लहना (अंगद) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया ।

गुरु नानक ने सिक्ख धर्म की स्थापना की । नानक सूफी संत बाबा फरीद के प्रभावित थे । इनकी मृत्यु 1538 ईस्वी में करतारपुर में हुई ।

चैतन्य स्वामी

इनका जन्म 1486 ईस्वी में नवदीप (बंगाल) के मायापुर गांव में हुआ था । इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र एवं माता का नाम शची देवी था । पाठशाला में चैतन्य को निमाई पंडित या गौरांग कहा जाता था । चैतन्य का वास्तविक नाम विश्वम्भर था । इन्होंने गोसाई संघ की स्थापना की और साथ ही है संकीर्तन प्रथा को जन्म दिया ।

इनके दर्शनिक सिद्धांत को अचिंत्य भेदाभेदवाद के नाम से जाना जाता है । ये संन्यासी बनने के बाद बंगाल छोड़कर पूरी (उड़ीसा) चले गए, जहां उन्होंने दो दशक तक भगवान जगन्नाथ की उपासना की । इनकी मृत्यु 1533 में हो गयी ।

गोस्वामी तुलसीदास

इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में राजापुर गांव में 1532 ईसवी में हुआ था । इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम तुलसी था। इनका विवाह रत्नावली से हुआ था । उन्होंने अवधी में रामचरितमानस की रचना की । इसके अतिरिक्त उन्होंने विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल आदि ग्रंथों की रचना की । इनकी मृत्यु 1623 ईस्वी में हुई थी । तुलसीदास मुगल शासक अकबर एवं मेवाड़ के शासक राणा प्रताप के समकालीन थे ।

धन्ना

धन्ना का जन्म 1415 ई. में एक जाट परिवार में हुआ था । राजपूताना से बनारस आकर ये रामानंद के शिष्य बन गए । कहा जाता है कि इन्होंने भगवान की मूर्ति को हठात् भोजन करवाया था ।

मीराबाई

मीराबाई का जन्म 1498 ईस्वी में मेड़ता जिले के चौकारी ग्राम में हुआ था । इनके पिता का नाम रतन सिंह राठौड़ था । इनका विवाह 1516 ईस्वी में राणा सांगा के बड़े पुत्र और युवराज भोजराज से हुआ था । अपने पति के मृत्यु के उपरांत ये पूर्णत: धर्मपरायण जीवन व्यतीत करने लगी ।

इन्होंने कृष्ण की उपासना प्रेमी एवं पति के रूप में की । इनके भक्ति गीत मुख्यतः ब्रजभाषा और आंशिक रूप से राजस्थानी में लिखे गए हैं तथा इनकी कुछ कविताएं राजस्थानी में भी है । इनकी मृत्यु 1546 ई. हो गई । मीराबाई तुलसीदास के समकालीन थी ।

रैदास (रविदास)

रैदास चमार जाति के थे और बनारस के रहने वाले थे । ये रामानंद के 12 शिष्यों में एक थे । इनके पिता का नाम रघु तथा माता का नाम घुरबिनिया था । ये जूता बनाकर जीविकोपार्जन करते थे । इन्होंने रायदासी संप्रदाय की स्थापना की । चित्तौड़ की रानी शाली रैदास की शिष्या थी ।

दादू दयाल

इनका जन्म 1544 ईस्वी में अहमदाबाद में हुआ था । इनका संबंध धुनिया जाति से था । ये कबीर के अनुयायी थे । सांभर में आकर उन्होंने ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना की ।

अकबर ने धार्मिक चर्चा के लिए इन्हें एक बार फतेहपुर सीकरी बुलाया था । इन्होंने ‘निपख’ नामक आंदोलन की शुरुआत की । सुंदरदास दादू के शिष्य थे । इनकी मृत्यु 1603 ई. राजस्थान के नराना में हो गई , जहाँ दादू पंथियों का मुख्य केंद्र है ।

शंकरदेव (1449-1569 ई.)

उन्होंने भक्ति आंदोलन का प्रचार- प्रसार असम में किया । ये चैतन्य के समकालीन थे , इसलिए इनको असम का चैतन्य भी कहा जाता है । शंकरदेव द्वारा स्थापित संप्रदाय एक शरण संप्रदाय के रूप में प्रसिद्ध है ।

सूरदास ( 1483-1563 ई.)

इनका संबंध स्वामी वल्लभाचार्य की शिष्य परंपरा से था । इनका जन्म 1483 ईस्वी में रूनकता नामक ग्राम में तथा मृत्यु 1563 ई. पारसौली नामक ग्राम में हुई । ये राधा वल्लभ संप्रदाय से जुड़े थे ।

इनकी प्रमुख रचनाओं में सूरसारावली, साहित्य लहरी तथा सूरसागर प्रमुख है ।

नरसिंह मेहता ( 1414-1481 ई.)

इनका परिचय जयदेव तथा कबीर से था । इनका कार्य क्षेत्र गुजरात था । गांधी जी का प्रिय भजन “वैष्णव जण तो तेणे कहिये जे पीर पराई जाणै रे ” के रचयिता नरसिंह मेहता ही थे ।

ज्ञानदेव ( 1275-1396 ई.)

ज्ञानदेव महाराष्ट्र के भक्त संतों में अग्रणी है । इन्होंने भागवत्गीता पर वृहद भाष्य लिखा जिसे ज्ञानेश्वरी के नाम से जाना जाता है । इन्होंने कई श्लोकों की भी रचना की जिसे अभंग के नाम से जाना जाता है।

नामदेव ( 1270-1350 ई.)

ये पेशे से दर्जी थे । माना जाता है कि वे महाराष्ट्र भक्ति आंदोलन तथा उत्तर भारत के एकेश्वरवाद आंदोलन के मध्य की कड़ी थे । इनके भक्ति गीत भी आदि ग्रंथ में संकलित है । महाराष्ट्र में नामदेव को बरकड़ी परंपरा (वैष्णव भक्ति परंपरा) में स्थान दिया जाता है ।

तुकाराम ( 1601-1650 ई.)

ये शिवाजी के समाकालीन थे । इनका जन्म पूना के निकट देही नामक स्थान पर हुआ था । ये बरकड़ी संप्रदाय से जुड़े हुए थे ।

संत रामदास ( 1608-1681 ई.)

रामदास घरकड़ी संप्रदाय से जुड़े हुए थे । इस संप्रदाय के संत सांसारिक तथा आध्यात्मिक बातों में सामंजस्य बना कर चलते हैं । रामदास ने दासबोध नामक ग्रंथ लिखा । ये छत्रपति शिवाजी के गुरु भी थे ।

उत्तर भारत के भक्ति संतों का कालानुक्रम-

काल भक्ति संत दर्शन/ संप्रदाय
1299- 1411 ई. रामानंद राम भक्ति (सगुण रूप)
1398- 1510 ई. कबीर दास निर्गुण ब्रह्म
1469- 1538 ई. गुरु नानक सिख धर्म
1544- 1603 ई. दादू दयाल परम ब्रह्म संप्रदाय , निपख मार्ग
1532 -1623 ई. तुलसीदास राम भक्ति
1483-1563 ई. सूरदास राधा वल्लभ संप्रदाय
1496-1546 ई. मीराबाई कृष्ण भक्ति
1414-14 81 ई.नरसिंह मेहता
1486-1533 ई.चैतन्य महाप्रभु  अचिन्त्य भेदाभेद
1449-1568 ई.शंकरदेव  कृष्ण भक्ति , एक शरण धर्म , महापुरुषीय संप्रदाय
1275-1396 ई. ज्ञानदेव 
1270-1350 ई.नामदेव  बरकड़ी परंपरा
1601-1650 ई.तुकाराम  बरकड़ी परंपरा
1533-1599 ई.एकनाथ  बरकड़ी परंपरा
1608-1681 ई.संत रामदास  घरकड़ी परंपरा

महत्वपूर्ण बिंदु –

🔸भक्ति आंदोलन का सूत्रपात दक्षिण भारत में सातवीं सदी के दौरान हुआ ।

🔸अप्पार, पल्लव नरेश महेंद्रवर्मन का समकालीन था।

🔸तीन सबसे पुराने अलवर संत – पोयगी, पुदम तथा पेय थे ।

🔸शिवाद्वैत मत के प्रवर्तक श्रीकांताचार्य थे ।

🔸शिव ज्ञानबोधम् की रचना मेयकंदार ने की ।

🔸श्रीपादाचार्य हरिदास ने पुरन्दरदास आंदोलन का श्रीगणेश किया ।

🔸कर्नाटक संगीत का पिता पुरन्दरदास को कहा जाता है ।

🔸वीरशैव संप्रदायिक को लिंगायत संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है ।

🔸बासव कल्याण के राजा बिज्जल कलचुरी के प्रधानमंत्री थे ।

🔸लिंगायतों की प्रमुख विशेषता जाति प्रथा का विरोध एवं शिवलिंग धारण करना है ।

🔸अल्लाना प्रभु एवं अक्का महादेवी लिंगायत संप्रदाय के संत थे ।

🔸पाशुपत संप्रदाय के संस्थापक लकुलीश थे ।

🔸गीतगोविन्द की रचना जयदेव ने की थी ।

🔸प्रथम बंगाली कवि चंडीदास को कहा जाता है ।

🔸राधा और कृष्ण के प्रेम पर मैथिली भाषा में विद्यापति ने लिखा ।

🔸बांग्ला व्याकरण तथा वर्णमाला की रचना विद्यापति ने की ।

🔸महाराष्ट्र का भक्ति आंदोलन पंढरपुर के विठोबा पर केंद्रित था ।

🔸नामदेव के गुरु विशोबा खेचर थे ।

🔸ज्ञानेश्वरी को मराठी गीता कहा जाता है ।

🔸ज्ञानेश्वरी का पहला विशिष्ट संस्करण एकनाथ ने प्रकाशित किया ।

🔸निर्गुण शब्द श्वेताश्वतरोपनिषद् से लिया गया है ।

🔸सतनामी संप्रदाय के संस्थापक जगजीवनदास थे ।

🔸बाबा मलूकदास इलाहाबाद में रहते थे ।

🔸सत्य प्रकाश एवं प्रेम प्रकाश की रचना धवनीदास ने की ।

🔸बिहार में सतनामी संप्रदाय के प्रवर्तक दरिया साहिब थे ।

🔸पंजाब में सतनामी संप्रदाय के प्रवर्तक गरीबदास थे ।

🔸गुरु नानक की याद में ही हुजूर साहब गुरुद्वारा बना है ।

🔸कबीर ने रैदास को संतों का संत कहा है ।

🔸भक्तमाल की रचना नाभाजी ने की ।

🔸ऋषि संप्रदाय कश्मीर में विकसित हुआ तथा ये शैव भक्ति से प्रभावित था ।

🔸महाराष्ट्र में महानुभाव पंथ की स्थापना हुई ,इसके संस्थापक गोविन्द प्रभु नामक संत थे । चक्रधर इसके प्रथम धर्म प्रचारक थे ।

🔸कर्नाटक में उडीची भक्ति का केंद्र था । कर्नाटक क्षेत्र में ही भक्ति का हरिदासी संप्रदाय का विकास हुआ ।

🔸भक्त कवयित्री अंडाल को दक्षिण की मीरा भी कहा जाता है । इनकी रचना का नाम थिरूपवाई है ।

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