विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन,सामाजिक व्यवस्था,नायंकार व आयंगर व्यवस्था

विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन

 विजयनगर साम्राज्य का शासन राजतन्त्रात्मक था । राजा को “राय” कहा जाता था। इस काल में भी प्राचीन काल की भांति राज्य की “सप्तांग विचारधारा” पर जोर दिया जाता था ।

प्राचीन भारत की राज्यभिषेक पद्धति के अनुरूप इस काल में राजाओं का भव्य राज्याभिषेक किया जाता था । राजा के चयन में राज्य के मंत्रियों और नायकों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती थी ।

अच्युतदेवराय ने अपना राज्याभिषेक तिरुपति मंदिर में संपन्न करवाया था । विजयनगर काल में भी दक्षिण भारत की “संयुक्त शासक” परंपरा का निर्वाह किया गया । युवराज की नियुक्ति के बाद उसका राज्याभिषेक किया जाता था जिसे युवराज पट्टाभिषेकम् कहते थे ।

प्रशासकीय संस्थाओं में राजपरिषद राजा की शक्ति पर नियंत्रण का सबसे शक्तिशाली माध्यम थी। इस परिषद के माध्यम से ही राजा शासन करता था और राज्य के समस्त मामलों एवं नीतियों के संबंध में परामर्श लेता था ।

कृष्णदेव राय ने अपने अनुपम ग्रंथ ” आमुक्तमाल्यद्” में राजा के आदर्श को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है ” ।

राज परिषद्– राज परिषद् प्रांतों के नायकों, सामंत शासकों, प्रमुख धर्माचार्यों, विद्वानों, संगीतकारों, कलाकारों, व्यापारियों और यहाँ तक विदेशी राज्यों के राजदूतों को शामिल करके गठित किया गया एक विशाल संगठन होता था ।

कृष्णदेव राय और उनके राजदरबार के प्रमुख विद्वान पेड्डाना दोनों ही इस परिषद के सदस्य थे ।

मंत्री परिषद्– राज परिषद् के बाद केंद्र में मंत्री परिषद् होती थी जिसका प्रमुख अधिकारी “प्रधानी” या “महाप्रधानी” होता था । यह मंत्री परिषद् विजयनगर साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी । इनकी सभाएँ वेंकटविलास मण्डप नामक सभागार में आयोजित की जाती थी ।

मंत्री परिषद् में संभवत 20 सदस्य होते थे । मंत्री परिषद् के अध्यक्ष को “सभा नायक” कहा जाता था । विद्वान, राजनीति में निपुण 50 से 70 वर्ष की आयु वाले स्वस्थ व्यक्तियों को ही इस मन्त्रीपरिषद् का सदस्य बनाया जाता था ।

केंद्र में दण्डनायक नामक उच्च अधिकारी भी होते थे । दण्डनायक पदबोधक नहीं था वरन् विभिन्न अधिकारियों की विशेष श्रेणी को दण्डनायक कहा जाता था ।

दण्डनाथ और सायण, बुक्का और हरिहर द्वितीय दोनों के मंत्री थे ।

राजा और युवराज के बाद केंद्र का सबसे प्रधान (मुख्य) अधिकारी प्रधानी होता था जिसकी तुलना हम मराठा कालीन पेशवा से कर सकते हैं ।

केंद्रीय सचिवालय – सचिवालय में विभागों का बंटवारा किया गया था और इसमें “रायसम” या सचिव, कर्णिकम् अर्थात् एकाउंटेंट जैसे अधिकारी होते थे । रायसम राजा के मौखिक आदेशों को लिपिबद्ध करता था तथा कर्णिकम लेखाधिकारी होता था ।

शाही मुद्रा रखने वाला अधिकारी मुद्राकर्त्ता कहलाता था ।

विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन
विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन

विजयनगर का प्रांतीय प्रशासन

🔸प्रान्त राज्य कहलाते थे ।
🔸मण्डल (कमिश्नरी) प्रांतों के अंतर्गत थे ।
🔸कोट्टम या वलनाडु जिले कहलाते थे ।
🔸नाडू ( परगना या तहसील ) कोट्टम या वलनाडू के अंतर्गत थे ।
🔸मेलाग्राम ( पचास ग्राम) नाडुओं के अंतर्गत थे ।
🔸स्थल एवं सीमा कुछ गांव के समूह होते थे ।

🔸प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई उर या ग्राम थी ।
🔸प्रांतों का विभाजन करने में सैनिक दृष्टिकोण का ध्यान रखा जाता था ।
🔸प्रांतों पर राजपरिवार के व्यक्तियों (राजकुमार) को ही गवर्नर के रूप में नियुक्त किया जाता था । गवर्नर को सिक्के प्रसारित करने, नये कर लगाने तथा पुराने करों को माफ करने, भूमिदान देने आदि का अधिकार प्राप्त था ।

🔸संगम युग में गवर्नरों के रूप में शासन करने वाले राजकुमारों ने उरैयर उपाधि धारण की ।
🔸प्रांत में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना प्रांतीय गवर्नरों का सबसे प्रमुख उत्तरदायित्व था ।

नायंकार व्यवस्था –

विजयनगर साम्राज्य की प्रांतीय प्रशासन व्यवस्था के संदर्भ में नायंकार व्यवस्था उसका एक बहुत महत्वपूर्ण अंग थी ।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में सेनानायकों को नायक कहा जाता था । नायक वस्तुतः भू-सामंत थे जिन्हें वेतन के बदले अथवा अधीनस्थ सेना के रखरखाव के लिए विशेष भूखंड अमरम प्रदान की जाती थी । अमरम् भूमि का उपयोग करने के कारण इन्हें अमरनायक भी कहा जाता था ।

अमरम् भूमि का उपयोग करने के संबंध में नायकों के दो प्रमुख उत्तरदायित्व थे – (१) इससे प्राप्त आय के एक अंश को उन्हें केंद्रीय खजाने में जमा करना पड़ता था । (२) उन्हें इसी भूमि की आय से राजा की सहायता के लिए एक सेना रखनी पड़ती थी ।

आयंगर व्यवस्था –

विजयनगर काल में ग्रामीण प्रशासन की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता आयंगर व्यवस्था थी । इस व्यवस्था के अनुसार एक स्वतंत्र इकाई के रूप में प्रत्येक ग्राम को संगठित किया जाता था जिस पर शासन के लिए बारह शासकीय व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता था । इस बारह शासकीय अधिकारियों के समूह को ‘आयंगर’ कहा जाता था । इन अधिकारियों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती थी ।

ब्रह्मदेय ग्राभ( ब्राह्मणों को भू अनुदान के रूप में प्रदत्त गांव ) की सभाओं को चतुर्वेदी मंगलम् कहा गया है ।

नाडू – यह गांव की एक बड़ी राजनीतिक इकाई थे। इनकी सभा को नाडु तथा इसके सदस्य को नात्तवार कहा जाता था ।

गैर ब्रह्मदेय ग्राम की सभा उर कहलाती थी ।

आयंगरों के पद आनुवांशिक होते थे । उन्हें वेतन के बदले लगान और कर मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी । इनको बिना जानकारी के संपत्ति का हस्तान्तरण और भूमि अनुदान नहीं किया जा सकता था ।

इन बारह आयंगर ग्रामीण कर्मचारियों में कर्णीकम, गाँव का एकाउंटेंट या प्रधान लिपिक होता था । तलारी, ग्राम का पुलिसकर्मी या चौकीदार होता था ।

राजस्व प्रशासन –

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण ‘लगान’ आय का प्रमुख साधन था । इसके अतिरिक्त अन्य प्रमुख स्रोत थे – संपत्ति कर, व्यापारी कर, व्यवसायी कर, उद्योग कर, सामाजिक और सामुदायिक कर ,अर्थदंड आदि ।

शिष्ट भू राजस्व को कहा जाता था । केंद्रीय राजस्व विभाग को अठावने (अस्थवन या अथवन) कहा जाता था । राजस्व नगद एवं जिंस दोनों में वसूल किया जाता था । नगर राजस्व को सिद्धदाय कहा जाता था ।

सामाजिक व सामुदायिक करों में ‘विवाह कर’ बहुत रोचक है । यह कर वर और कन्या दोनों पक्षों से वसूल किया जाता था ।

उबलि: ग्राम में विशेष सेवाओं के बदले दी जाने वाली लगान मुक्त भूमि की भू-धारण पद्धति थी ।

रत्त कोड़गे – युद्ध में शौर्य का प्रदर्शन करने वाले मृत लोगों के परिवार को दी गई भूमि को कहा जाता था ।

कुट्टगि – ब्राह्मण, मंदिर या बड़े भूस्वामी, जो स्वयं कृषि नहीं करते थे, किसानों को पट्टे पर भूमि देते थे ऐसी भूमि को कुट्टगि कहा जाता था ।

वारम व्यवस्था – भूस्वामी एवं पट्टेदार के मध्य उपज की हिस्सेदारी को वारम व्यवस्था कहते थे ।

वे कृषक मजदूर जो भूमि के क्रय- विक्रय के साथ ही हस्तांतरित हो जाते थे, कूदि कहलाते थे ।

कर्णिक नामक आयंगर के पास जमीन के क्रय-विक्रय से संबंधित समस्त दस्तावेज होते थे ।

विजयनगर साम्राज्य में लगान के रूप में उपज का 1/6 वाँ भाग लिया जाता था ।

सामाजिक जीवन –

यह भारतीय इतिहास का अंतिम साम्राज्य था जो वर्णाश्रम अवस्था पर आधारित परंपरिक सामाजिक संरचना को सुरक्षित और संबंधित करना अपना कर्तव्य समझता था । इस समय उत्तर भारत से बहुत बड़ी संख्या में लोग दक्षिण में आकर बस गए थे । इन्हें ‘बड़वा’ कहां जाता था ।

मध्य वर्गों में शेट्टी या चेट्टी नामक एक बहुत बड़ा समूह था । अधिकांश व्यापार इन्हीं के हाथों में था । चेट्टी बहुत अच्छे लिपिक एवं कार्यों में दक्ष थे ।

चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करने वाले तथा दस्तकार वर्ग के लोगों को “वीर पांचाल” कहा जाता था ।

इस काल की समाजिक व्यवस्था की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि नीची जाति के कुछ वर्गों ने ऊंची जाति के लोगों के विशेषाधिकारों को हड़प लिया । जिन निचली जातियों के उच्च जातियों को विशेषाधिकार प्रदान किए गए ,वे सत्-शूद्र या अच्छे शूद्र कहलाए गए ।

दास प्रथा –

विजयनगर में दास प्रथा प्रचलित थी । विदेशी यात्रियों के विवरण और समकालीन अभिलेख पुरुष एवं महिला दासों का उल्लेख करते हैं ।

मनुष्यों के क्रय- विक्रय को ‘वेस-वग’ कहा जाता था । निकोली कोंटी ने लिखा है कि ” विजयनगर साम्राज्य में विशाल संख्या में दास हैं , जो कर्जदार अपना ऋण अदा नहीं कर पाते हैं उन्हें सर्वत्र ऋणदाता द्वारा अपनी संपत्ति(दास) बना लिया जाता था ।

स्त्रियों की स्थिति –

विजयनगर समाज में स्त्रियों की बड़ी सम्मानजनक स्थिति थी । कुछ स्त्रियां महान विदुषियां और प्रसिद्ध साहित्यकार थी । संगीत और नृत्य उनकी शिक्षा के प्रमुख अंग थे ।

संपूर्ण भारतीय इतिहास में विजयनगर साम्राज्य एकमात्र साम्राज्य था, जिसने विशाल संख्या में स्त्रियों को विभिन्न राजकीय के पदों पर नियुक्त किया ।

कन्यादान को आदर्श विवाह माना जाता था । राज परिवार एवं सामंतों के अतिरिक्त अन्य वर्गों में एक पत्नीत्व की प्रथा थी ।

समाज में पर्दा प्रथा प्रचलित थी । इस समय विधवाओं का जीवन बहुत हेय एवं अपमानजनक समझा जाता था ।

मंदिरों में देवपूजा के लिए रहने वाली स्त्रियों को देवदासी कहा जाता था । इन्हीं जीविका के लिए भूमि दे दी जाती थी अथवा नियमित वेतन दिया जाता था ।

सती प्रथा– विजयनगर साम्राज्य में सती प्रथा को सहगमन अर्थात् मृतपति के साथ महाप्रयाण कहा जाता था ।

1354 ईस्वी में विजयनगर के एक अभिलेख में मालागौडा नामक महिला का अपने पति की मृत्यु के बाद सती या सहगमन करके स्वर्गारोहण का उल्लेख है ।

वस्त्राभूषण – सामान्य वर्ग के पुरुष धोती और सफेद सूती रेशमी कमीज पहनते थे । कंधे पर दुपट्टा डालने का भी प्रचलन था । राज्य परिवार की स्त्रियां जिसे पावड कहते थे तथा दुपट्टा और चोली पहनती थी।

युद्ध में वीरता दिखाने वाले पुरुषों के लिए ‘गण्डपेद्र’ नामक पैर में धारण करने वाले कड़े को सम्मान का प्रतीक माना जाता था ।

शिक्षा एवं मनोरंजन –

इस समय शतरंज एवं पासा खेल बहुत लोकप्रिय था । कृष्णदेव राय स्वयं बहुत बड़े शतरंज प्रेमी थे ।

उन्होंने मठों और असंख्य अग्रहारों की स्थापना करके शिक्षा और ज्ञान को प्रोत्साहन दिया । मंदिर, मठ एवं अग्रहार विद्या के केंद्र थे ।

इतिहास, काव्य, नाटक, आयुर्वेद तथा शास्त्र एवं पुराण अध्ययन के लोकप्रिय विषय थे ।

विजयनगर के तुलुव वंश ने भी विद्या एवं ज्ञान को पर्याप्त प्रश्रय दिया । मनोरंजन के क्षेत्र में नाटक और यक्षगान इस काल में बहुत लोकप्रिय थे ।

बोमलाट एक छाया- नाटक था जिसका आयोजन मण्डपों में किया जाता था ।

मुद्रा व्यवस्था –

विजयनगर का सर्वाधिक प्रसिद्ध सिक्का स्वर्ण का “वराह” था जिसे विदेशी यात्रियों के हुण, परदौस या पगोडा के रूप में उल्लेख किया है ।

सोने के छोटे सिक्के को प्रताप तथा फणम् कहा जाता था । चाँदी के छोटी सिक्के तार कहलाते थे ।

विजयनगर साम्राज्य के प्रमुख पदाधिकारी तथा उनके कार्य –

🔸नायक – बड़े सेनानायक ( सैनिक भू-सामन्त)

🔸महानायकाचार्य – ग्राम सभा के कार्यवाहियों के निरीक्षण करने वाले अधिकारी

🔸दण्डनायक – सैनिक विभाग का प्रमुख तथा सेनापति ।

🔸प्रधानी अथवा महा प्रधानी – मंत्रीपरिषद् का प्रमुख (प्रधानमंत्री )

🔸सभानायक – मंत्री परिषद् का अध्यक्ष

🔸रायसम् – सचिव

🔸कर्णिकम् – लेखाधिकारी

🔸अमरनायक – सामन्तों का वह वर्ग जो राज्य को सैन्य मदद देने के लिए बाध्य था ।

🔸आयंगर – वंशानुगत ग्रामीण अधिकारी ।

🔸स्थानीय नौकरशाह – शासकीय इकाई पर शासन करने के लिए इनकी नियुक्ति की जाती थी ।

🔸पालिगार– सेनापति अथवा नायक ।

🔸स्थानिक – मंदिरों की व्यवस्था करने वाले अधिकारी ।

🔸मानेय प्रधान – गृहमंत्री

🔸मुद्रा कर्ता– शाही मुद्रा रखने वाला अधिकारी ।

🔸सेनतेओवा – ग्राम का लेखाधिकारी ।

🔸तलर – ग्राम का रखवाला ।

🔸अन्त्रिमार – ग्राम प्रशासक का एक अधिकारी ।

🔸परूपत्यगार – किसी स्थान विशेष में राजा या गवर्नर का प्रतिनिधि ।

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