Satavahana Dynasty in Hindi | सातवाहन वंश का इतिहास

Satavahana Dynasty in Hindi ( सातवाहन वंश का इतिहास)

आंध्र (गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटी) में सिमुक नामक व्यक्ति ने लगभग 60 ई. पू. में सातवाहन वंश की नींव डाली । यह राजवंश आंध्र और सातवाहन दोनों नामों से विख्यात है ।

Satavahana Dynasty in Hindi
Satavahana Dynasty in Hindi

सातवाहन वंश के शासक

सातवाहन वंश के प्रमुख शासक थे- सिमुक, शातकर्णि, गौतमीपुत्र शातकर्णि, वशिष्ठीपुत्र, पुलुमावी तथा यज्ञश्री शातकर्णि

🔸सातवाहन वंश शासकों ने अपनी राजधानी प्रतिष्ठान ( औरंगाबाद ,महाराष्ट्र)में स्थापित की ।

🔸पुराणों में सातवाहन वंश को ‘आन्ध्रजातीय’ तथा ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है ।

🔸इस वंश के इतिहास के लिए मत्स्य तथा वायु पुराण विशेष रूप से उपयोगी है ।

🔸सातवाहन वंश के शासकों को दक्षिणाधिपति तथा इनके द्वारा शासित प्रदेशों को दक्षिणापथ कहा जाता है ।

🔸सिमुक ने 60 ई. पू. में कण्व वंश के राजा सुशर्मा की हत्या कर दी और सातवाहन वंश की स्थापना की ।

🔸सिमुक का राज्यकाल 37 ईसा पूर्व तक माना जाता है ।

🔸उसके उपरांत शातकर्णि प्रथम ने सातवाहन वंश की शक्ति एवं सत्ता का विस्तार किया ।

🔸शातकर्णि प्रथम ने दो अश्वमेध यज्ञ किया और समस्त दक्षिण भारत पर अपनी सार्वभौम सत्ता स्थापित की ।

🔸पुराणों में शातकर्णी प्रथम को कृष्ण का पुत्र कहा गया है । इसमें दो अश्वमेघ तथा एक राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया ।

🔸शातकर्णि प्रथम इस वंश का प्रथम योग्य शासक था । इसकी उपलब्धियों का ज्ञान नायानिका के नासिक लेख से होता है ।

🔸उसकी राजधानी गोदावरी नदी के तट पर स्थित प्रतिष्ठान (आधुनिक पैठन) नामक नगरी थी ।

🔸शातकर्णि प्रथम की मृत्यु के बाद शकों के आक्रमण के फलस्वरूप सातवाहनों की शक्ति में ह्रास होने लगा और महाराष्ट्र में शक वंश का शासन आरंभ हुआ , जो पश्चिमी क्षत्रप वंश कहा जाता है ।

🔸सातवाहन वंश का 23वें शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी ने पश्चिमी क्षत्रपों की शक्ति को नष्ट करके पुन: अपने वंश की शक्ति, समृद्धि और सत्ता स्थापित की ।

🔸गौतमीपुत्र शातकर्णी , इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था । इसके सैन्य विजयों की जानकारी इसकी माँ बालश्री के नासिक प्रशस्ति से मिलती हैं ।

🔸वशिष्ठपुत्र पुलुमावि ने उज्जैन के शक महाक्षत्रप रुद्रदामन प्रथम की पुत्री से विवाह किया ।

🔸रुद्रदामन ने उससे वह समस्त भूभाग छीन लिया, जिसे उसने पश्चिमी क्षत्रपों को पराजित करके जीता था ।

🔸सातवाहन वंश के 27वें शासक यज्ञश्री शातकर्णि ने उज्जैनी के क्षत्रपों से कुछ भू-भागों को पुनः अपने अधिकार में करके अपनी वंशकीर्ति पुन: स्थापित की ।

🔸यज्ञश्री ने कई प्रकार की मुद्राएं चलाई, जिनमें से कुछ पर जलपोत भी अंकित है ।

🔸इस वंश के सभी शासक हिंदू धर्म के अनुयायी थे ।

🔸उन्होंने वैदिक यज्ञों और समाज में वर्णाश्रम व्यवस्था को प्रतिष्ठित किया तथा विदेशी यवनों और शकों से संघर्ष करते रहे ।

🔸उनके शासनकाल में वाणिज्य तथा व्यापार, कृषि एवं अन्य उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन मिला तथा चाँदी, ताँबे,सीसे और कांसे की मुद्राओं का विशेष प्रचलन हुआ ।

🔸सातवाहन अपना सिक्का ढालने में जिस सीसे का इस्तेमाल करते थे, उसे रोम से मंगाया जाता था ।

🔸उन्होंने ही सर्वप्रथम ब्राह्मणों को भूमि अनुदान देने की प्रथा आरंभ की ।

🔸सातवाहन की राजकीय भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्यी थी ।

🔸सातवाहन राजाओं ने पश्चिमी दक्कन में अनेक चैत्य एवं विहार बनवाये, जिनमें कार्लें का चैत्य सुप्रसिद्ध है । 40 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊँचा यह चैत्य वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है ।

🔸सातवाहनों की महत्वपूर्ण स्थापत्य कृतियाँ हैं – कार्लें का चैत्य, अजंता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण एवं अमरावती कला का विकास ।

🔸सातवाहन शासक के समय के प्रसिद्ध साहित्यकार राजा हाल एवं गुणाढ्य थे ।

🔸हाल ने गाथासप्तशती तथा गुणाढ्य ने बृहत्कथा नामक पुस्तकों की रचना की ।

🔸सातवाहन राजकुल पितृतंत्रात्मक था, क्योंकि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी पुत्र ही होता था ।

🔸ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन का काम गौल्मिक को सौंपा । गौल्मिक एक सैनिक टुकड़ी का प्रधान होता था। जिसमें नौ रथ,नौ हाथी, 25 घोड़े और 45 पैदल सैनिक होते थे ।

🔸शातकर्णी एवं अन्य सभी सातवाहन शासक दक्षिणापथ के स्वामी कहे जाते थे ।

🔸सातवाहन राज्य ने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सेतु का काम किया ।

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